समर्पण दिवस

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स्व का अर्पण ही समर्पण है । जब स्व ही मिट गया तब अन्य ही बचा, चाहे वह प्रेमिका हो या परमात्मा । जब अपनी हस्ती ही न बची फिर भय कैसा ? फिर चिंता कैसी ? फिर क्या पाना और क्या खोना ? सारा संताप अहम् का है। “डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता” “मैं” ही डुबोता है, समर्पण ही तारता है ।

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