कल मुझे जो पसंद था आज वो नापसंद है, और जो नापसंद था वो पसंद है । यह क्या खेल है ?

Kapil Chaudaha0 Comments

पसंद-नापसंद का यह खेल हमारी आधी-अधूरी चेतना से विकसित होता है । उत्तेजना के किसी क्षण में हमें एक व्यक्ति या वस्तु पसंद आ जाती है । और जब उत्तेजना का ज्वर उतरता है तब वही पसंद नापसंद में बदल जाती है । हमें लगता है कि अगले व्यक्ति ने हमें सुख देना बंद कर दिया । जबकि कारण है उत्तेजना का ख़त्म होना । चूंकि हम हमेशा अपने सुख-दुख​ का कारण बाहर खोजते हैं इसलिए निराश होते हैं । एक विकसित चेतना में कभी उत्तेजना का ज्वार-भाटा नहीं उठता । वह हमेशा शांत है । उसमें पसंद-नापसंद​ की लहरें नहीं उठतीं । वहां बस सहज प्रेम है ।

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