ध्यान क्या है?

ध्यान को आमतौर पर धर्म से जोड़कर देखा जाता है । इसे एक प्रकार का कर्मकाण्ड माना जाता है । एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम जो पराजगत की समस्याओं को हल करने में सहायक है । स्वभावतः धार्मिक लोगों की इसमें विशेष रूचि मालूम होती है । तार्किक और वैज्ञानिक बुद्धि आमतौर पर इसकी आलोचना करती है या इससे दूरी बनाये रखती है । ये धारणाएँ और पूर्वाग्रह ध्यान की समझ को संकुचित कर देते हैं । इसीलिए यह ज़रूरी है कि हम इनका विस्तार से विश्लेषण करें ।
            आध्यात्मिक विज्ञान के अनुसार, समस्त जगत में एक सर्वव्यापक प्रज्ञा यानि यूनिवर्सल इंटेलिजेंस व्याप्त है । चर-अचर जगत के हर कण में ये प्रज्ञा मौजूद है । ये एक प्रकार का नेटवर्क पैदा करती है जो ब्रह्मांड के हर जीव को दूसरे जीव से जोड़ता है । इस नेटवर्क के माध्यम से संदेशों का आदान प्रदान होता है । वैसे ही जैसे एलेक्ट्रोमेग्नेटिक, विद्युत-चुंबकीय, नेटवर्क से संदेशों का आदान प्रदान होता है । आइए इसे कुछ उदाहरणों से समझें । क्या आपने कभी गौर किया है कि जब आपको ठंड लगती है तो सबसे पहले उँगलियाँ सुन्न होना शुरू होती हैं ? ऐसा क्यों होता है ? यह शरीर का इंटेलिजेंस है । यह इंटेलिजेन्स शरीर के कम महत्वपूर्ण हिस्सों जैसे की उँगलियाँ से ऊर्जा खींचकर अधिक महत्वपूर्ण अंगों जैसे हृदय और मस्तिष्क तक पहुँचाता है । ऐसे ही, जब अचानक कभी आपकी आँखो पर तेज़ प्रकाश पड़ता है तो आँखे तुरन्त बंद हो जाती है । क्यों ? क्योंकि प्रकाश की अधिक मात्रा आँखो को नुक़सान पहुँचा सकती है।
             यह प्रज्ञा स्वतन्त्र रूप से काम करती है ऐसा करने के लिये इसे व्यक्ति से किसी निर्देश की आवश्यकता नहीं होती । यह न केवल मनुष्यों में बल्कि पशु-पक्षीयों में भी उतना ही कार्यरत है । ऐसे बहुत सारे पक्षी हैं जो एक विशेष मौसम के दौरान अपना पर्यावास बदलते हैं । वह एक स्थान से उड़कर सैकड़ों मील दूर दूसरे स्थान जाते हैं और इन्हें किसी दिशासूचक यंत्र की आवश्यकता नहीं होती । अंतस प्रज्ञा का एक अनुपम उदाहरण भालू में देखने को मिलता है। जब सर्दी बहुत बढ़ जाती है, तब भालू सुप्त अवस्था में चला जाता है । अपने बचाव के लिए वह अपने शरीर की चयापचय यानि मेटाबोलिज़म को इतना धीमा, इतना सुप्त कर लेता है कि उसे कम से कम ऊर्जा व्यय करनी होती है । और वो ऊर्जा का संरक्षण करके अपने शरीर को गर्मी देता रहता है । ऐसा कई महीनों तक अबाध रूप से चलता रहता है । अब यह एक प्रकार का शवासन है । शवासन में हमारी सबसे कम ऊर्जा का व्यय होता है । भालू ने निश्चित ही पतंजलि का योग सूत्र तो नहीं पढ़ा यह समझने के लिए कि शवासन क्या होता है । योग सूत्र का शवासन भालू को स्वाभाविक ही पता है । भालू उस ज्ञान के साथ ही पैदा हुआ है ।
             ये सारे उदाहरण इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मानवीय बुद्धि से ऊपर भी कोई एक प्रज्ञा है । लेकिन क्या हम इस ज्ञान से वंचित है ? वंचित तो नहीं है लेकिन इसके प्रति जागरूक नहीं है । ये सारी घटनाएँ हमारे शरीर में भी होती हैं और हमारे आसपास भी होती हैं । लेकिन हम इनको देख नहीं पाते । ध्यान क्या है ? यही है ध्यान, जागरूक होना, देख पाना कि समस्त ब्रह्मांड एकलयता में जीता है । हर एक चीज़ आपस में दूसरे से बँधी हुई है । एक दूसरे पर निर्भर है । हम अस्तित्व से प्रथक नहीं है बल्कि उसी के अभिन्न हिस्से हैं । यह समझ ही ध्यान है । ध्यान है पूरे अस्तित्व से एकलयता प्राप्त कर लेना ।
             यह लयता कैसे आती है ? यह लयता आती है विचार-शून्य होने से । हम जब विचारों के शोरगुल से अलग होते हैं तो हम देखते हैं कि हम इस जगत के हर एक व्यक्ति, हर एक चीज़ से जुड़े हुए हैं । यहाँ स्व और अन्य जैसे विभाजन नहीं हैं । जीवन अद्वैत है । यहाँ दो हैं ही नहीं । यह समझ है ध्यान ।
            इस समझ के न होने से हम हमेशा एक डर में जीते रहते हैं । पेरानोईया यानि यह भय कि हमें कोई नुक़सान पहुँचाना चाहता है लगभग हर व्यक्ति में पाया जाता है । लगभग हर व्यक्ति इस मानसिक बीमारी से पीड़ित है । किसी न किसी रूप में हम भय में जीते हैं इसीलिए हम इतनी सुरक्षा करना चाहते हैं हर वक़्त । सुरक्षा की आकांक्षा ही इस बात का सूचक है कि हम भय में जी रहे हैं । यदि हम में से हर एक व्यक्ति अपने अंदर झाँक कर देखे तो वो पायेगा कि भय किसी न किसी रूप में उसे परेशान कर ही रहा है । अब यह भय है क्या ? हमारे बहुत सारे भय तो मात्र काल्पनिक हैं । अब जैसे एक बार मैं एक शांत स्थान पर ध्यान कर रहा था तो सन्नाटे में मुझे अचानक एक पायल की छनक की आवाज़ सुनाई दी । मैंने जब आँखें खोल कर देखना चाहा कि आसपास कोई है क्या तो वहाँ मुझे कोई नहीं दिखा । जब मैंने गौर से उस छनक को दोबारा सुना तो मुझे पता चला कि वह छनक तो किसी एक पक्षी की आवाज़ है । उस दिन मुझे यह अनुभूति हुई कि क्यों सुनसान स्थानों पर लोगों को यह भ्रम होता है कि यहाँ कोई भूत है शायद । होता क्या है कि ठंड के दिनो में कोहरा होता है, सफ़ेद कोहरा । और वो अपना आकार बदलता रहता है हवा के कारण । यदि कोई व्यक्ति ऐसे क्षेत्र से गुज़र रहा हो तो उसको यह भ्रांति होना सम्भव है कि कोई सफ़ेद कपड़े पहने हुए है, वो चल रहा है, और वो स्त्री ही है क्योंकि पायल की छनक की आवाज़ भी आ रही है । अब जैसे ही आवाज़ आती है तो वह व्यक्ति यह देखने की जगह कि कुछ है भी या नहीं, तुरन्त भागने लगता है । जितना भागता है उतना भय उसके पीछे भागता है, और उस भय से भागने के लिये वह और तेजी से भागता है, और उतना ही गहराई में मानने लगता है कि उसके पीछे कोई भाग रहा है । और उसके बाद वो इस विश्वास में जीने लगता है, पूरी उम्र इस विश्वास में जीता है, कि उसने भूत देखा है । यदि वो रुक कर, थोड़ा सा शांत हो कर देखने का प्रयास करता कि वहाँ कुछ है भी, पायल की छनक है भी तो भय से मुक्त हो सकता था । लेकिन उसने यह भय हमेशा के लिए अपने अंदर पाल लिया । ऐसे कितने ही भय हमने अपने अंदर पाले हुए हैं । इसी के कारण हम निर्जन स्थानों पर रात में जाने से बचते हैं । परिणामस्वरूप, हम सन्नाटे की ख़ूबसूरती को कभी नहीं जान पाते ।
             इस तरह हम देखते हैं कि लोग ऐसी-ऐसी चीजों से डरते रहते हैं जो हैं ही नहीं । और ऐसे सौन्दर्य और आनंद से चूकते जाते हैं जो सच में है । मुझे एक घटना याद आती है । एक बार मैं अपने एक साथी शिक्षक के साथ विश्वविद्यालय के काम से कटनी से भिलाई जा रहा था । अब चूँकि हमें रेलवे में आरक्षण नहीं मिला था तो हमें सड़क मार्ग से जाना था । जितने लोगों ने यह बात सुनी कि हम सड़क मार्ग से जा रहे हैं सबने हमें सलाह दी कि वह रास्ता ख़तरनाक है क्योंकि वह जंगल से होकर निकलता था – तक़रीबन 500 किलोमीटर के सफ़र में 250-300 किलोमीटर तो घने जंगल थे – तो हर किसी ने हमें यह सलाह दी कि हम न जायें सड़क मार्ग से । लेकिन मैंने अपने अंदर यह महसूस किया कि अस्तित्व ने यह संकेत दिया, “जाओ” । अंततः हमने यह निर्णय लिया कि हम सड़क मार्ग से जायेंगे । हमने यात्रा शुरु की । जैसे शहर की आबादी से दूर निकले और जैसे ही जंगल में प्रवेश किया, चारों ओर से घनघोर अँधेरा ने हमें घेर लिया । हमारी गाड़ी चलती जाती थी । कभी-कभी 10-15 किलोमीटर तक न कोई व्यक्ति, न कोई वाहन ! बस सन्नाटा और आसपास घने पेड़ ! बीच में बारिश भी होने लगी । जब बिजली कड़कती थी पूरे आसमान में जैसे प्रकाश की बाढ़ आ जाती थी ! इतना सुंदर नज़ारा कि उसने हमारी आँखो से नींद ही चुरा ली ! अँधेरे और प्रकाश का यह लुका-छुपी का खेल हम देखते थे । कभी बिजली चमकती थी, फिर अँधेरा हो जाता था । जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गये सन्नाटा गहराता गया । हम बड़ी उत्सुकता से आसपास देखते थे कि कोई जानवर भी मिल जाए देखने । इस तरीक़े से रात बीतती गयी । 2-3 घंटे से ज़्यादा हम सो भी नहीं पाये । इतने मनोरम दृश्यों को कौन चूकना चाहेगा ! तक़रीबन 5 बजे के आसपास जब सुबह हुई तो पहली बार मैंने देखा कि सुबह खिलती कैसे है ! अभी तक तो जीवन में सुबह उदित होते देखी थी । दिन खिलता कैसे है, ब्लॉसम कैसे होता है, यह केवल और केवल जंगल में ही पता चला मुझे । बस उस खिलती हुई सुबह में हम अंदर प्रवेश करते गये । जीवन का काव्य पहली बार मैने खिलते हुए देखा ! चारों तरफ़ शांत पेड़ ! मानो सुबह होने पर अँगड़ाई लेते हुए ! अपनी नींद से जागते हुए ! पक्षी अपने घोंसलों में कलरव करते हुए ! इतना शुद्ध जीवन ! मनुष्यों के प्रदूषित जीवन से बिल्कुल अछूता ! यह सब देखते हम अपने गन्तव्य तक पहुँच ही गये, सुरक्षित । भय था ही कहाँ ? यदि हम उस झूठे भय से डर जाते तो हम जीवन के इस अनमोल अनुभव को चूक जाते ।
             काल्पनिक भयों से बचते-बचते हम बेजान जीवन जीने लगते हैं । ये भय हैं ही नहीं, ध्यान यही बताता है । ध्यान हमें भय से लड़ने का साहस नहीं देता । यह कोई ताक़त नहीं देता कि हम अपने भय का सामना कर पाये । ध्यान तो हमें यह बताता है कि भय है ही नहीं । यह बात बड़ी गहरी हैं । इसे बड़े ध्यान से समझें । ध्यान से हम शक्तिशाली नहीं बन जाते हैं, हममें हिम्मत नहीं आ जाती है कि जीवन के डरों को हम नियंत्रित कर लें, काबू में कर लें, उन्हें हरा दें । ध्यान तो जागरण है । ध्यान तो आँखो का खुलना है । जैसे ही आँखें खुलती है तो दिख जाता है कि किसी से लड़ना नहीं है क्योंकि कुछ है ही तो नहीं लड़ने के लिये । जो ध्यान नहीं करता वो नींद में है । और जो बेहोश है वो हमेशा डरा हुआ होगा । इसीलिए उसे कुछ चाहिये जो उसे उसके भय से मुक्त करा सके । जो उसे शक्ति दे ताकि वो अपने डरों को हरा सके । जो ध्यान में है, जो जागा हुआ है, उसे दिख रहा है कि कुछ है ही नहीं जिससे डरना है ।
             ध्यानी कोई साहसी व्यक्ति नहीं होता है, ध्यानी बस निर्भय होता है । साहसी होने और निर्भय होने में बहुत अंतर है । साहसी व्यक्ति वो होता है जो यह मानता है कि ख़तरा तो है लेकिन वो डरता नहीं है । निर्भय होने का मतलब है जो भय से ही मुक्त हो गया है । जिसे दिख गया है कि कोई भय नहीं है । ध्यान हमें यह समझ देता है, यह अंतर्दृष्टि देता है । और जैसे ही यह अंतर्दृष्टि आती है अस्तित्व पर भरोसा भी आता है । दरअसल अंतर्दृष्टि और भरोसा अलग अलग नहीं है, यह समसामयिक घटनाएँ है । ये एक साथ होती हैं । भरोसा अंधा होता है क्योंकि उसकी बाहरी आँखें बंद होती हैं । भरोसा अंतर्दृष्टि से देखता है । जितनी अंतर्दृष्टि आती है उतनी ही समझ आती है, उतने ही हम भय से मुक्त होने लगते हैं । क्योंकि हम देख पाते हैं कि हम तो अस्तित्व के ही हिस्से हैं और हर कुछ उसी से तो निकला है । तो फिर भय किससे जब अस्तित्व है ही और फिर भय किसके जब अस्तित्व ही है ? “जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद, फिर ये हंगामा ए ख़ुदा क्या है ?” जिसे दिख गया कि जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद, फिर यह हंगामा क्या है ? वो भय से मुक्त हो गया ।
            ध्यान बस यह समझ दे देता है । तो ध्यान हमें शून्य करता है भय से भी और हर एक विचार से । तब हम निर्भार होकर जी पाते हैं । कृष्णमूर्ति कहते हैं कि “थॉट डिवाइड्स” विचार विभाजित करता है । विचार हमें तोड़ता है । आई और यू में, मैं और तुम में । जब मैं अलग हूँ और तुम अलग हो तो मुझे इस बात का ख़तरा बना रहता है कि तुम मुझे नुक़सान पहुँचा सकते हो । जब हम विचारशून्य हो जाते है, उस निर्विचार की अवस्था में न मैं हूँ और न तुम हो । फिर भय किससे ?
             ध्यान हमें भयों से मुक्त्त करता है । जीवन के साथ जोड़ता है, एकलयता लाता है । हम सभी के होते हैं और सब हमारे होते हैं । और इस अद्वैत से ख़ूबसूरत, आनंदपूर्ण अनुभव कुछ भी नहीं हो सकता । तो ध्यान बहुत ज़रूरी है जीवन को समझने के लिए और प्रकृति के साथ, अस्तित्व के साथ एकात्मता स्थापित करने के लिये । जब हम अस्तित्व के साथ एक हो जाते हैं तो हम जान पाते हैं कि यह जो अस्तित्व ने जीवन-गीत रचा हुआ है उसके हम भी एक शब्द हैं । उसके संगीत के हम भी एक एक सुर हैं । और समष्टि के संगीत का सुर बन पाना, यह तो अहोभाव से भर देता है हमें !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *