ध्यान और ख़तरा

एक बार कटनी प्रवास के दौरान मुझे कुछ निर्जन क्षेत्रों में ध्यान करने का अवसर प्राप्त हुआ । शहर की आबादी से दूर, शोरगुल से परे, किसी पेड़ के आँचल तले, चट्टान की गोद में बैठ कर और अँधेरे में डूब कर ध्यान करने का आनंद अदभुत, अविस्मर्णीय था ! हर दिन शाम होते ही कुछ छात्रों के साथ मिलकर मैं इन क्षेत्रों के लिए रवाना हो जाता था । वहाँ हम चट्टानों पर बैठ कर ध्यान में रमने लगते थे । कभी अपने अंदर के जगत में डूबते थे, कभी आँखें खोल कर सामने क्षितिज में डूबते सूरज को देखते । और ये तब तक चलता रहता जब तक सूरज डूब ही ना जाता । फिर अँधेरा हमें अपने आग़ोश में ले लेता । फिर असली चुनौती शुरू होती क्योंकि अँधेरे में ध्यान कर पाना, वो भी एक निर्जन क्षेत्र में, खुले आकाश के नीचे, उसके अपने ख़तरे थे । निस्तब्ध वातावरण में हल्की सी हवा भी आस-पास पड़े सूखे पत्तों में सनसनाहट पैदा कर देती थी ! निस्पंद हवा में आस-पास के छोटे-से-छोटे जीव-जन्तु की धीमी सी आवाज़ इतनी ऊँची सुनाई देती थी ! कभी पेड़ो से कोई पत्ता गिरता और लहराता हुआ छू कर निकल जाता । ऐसा लगता मानो कोई कीड़ा-मकोड़ा ऊपर गिर गया हो । हल्की-सी आहट भयाक्रांत कर देती, कम्पित कर देती ! ध्यानी सहसा आंख खोल कर आस-पास देखने लगते । अपने-आप को सुरक्षित पाकर फिर आँखें बंद करते ध्यान में डूबते ।
            धीरे-धीरे एक बात स्पष्ट होने लगी कि ध्यान और ख़तरे का अंतरसम्बंध है । यदि हम याद करें तो हिन्दू, बुद्धिस्ट, जैन धर्म-ग्रन्थ ऐसी अनेकानेक कहानियों से भरे पड़े हैं जहां ऋषि-मुनि, साधक, खोजी, ध्यानी, इन्होंने अपनी साधना के लिए जंगलों या पहाड़ों को चुना । इसका कारण क्या था ? एक कारण जो आमतौर पर हम सभी जानते हैं वो यह है कि ध्यान के लिए शांति चाहिए होती है जो की इन स्थानों पर सहज ही उपलब्ध हो जाती है । यहाँ आस-पास हमें कोई परेशान करने वाला नहीं होता और हम आसानी से ध्यान में उतर सकते हैं । लेकिन एक और कारण है । वो कारण यह है कि इन क्षेत्रों में भय पैदा होता है क्योंकि आप अकेले होते हो । आपने कभी गौर किया होगा कि जैसे ही आप किसी अँधेरे कमरे में प्रवेश करते हैं अचानक आप वर्तमान में आ जाते हैं । आप अतीत या भविष्य में हों, एक कमरे में बैठे हों, आप अतीत के बारे में कुछ सोच रहे हों, भविष्य के बारे में कुछ सोच रहे हों और अचानक लाइट चली जाये तो आप देखेंगे कि आप अचानक वर्तमान में आ जाते हैं । क्या कारण है इसका ? इसका कारण यह है कि जहाँ कहीं भय होता है वहां हम वर्तमान में होते हैं । कभी यदि आपको याद हो कि आप एक सूनसान सड़क में अकेले जा रहे हैं उस वक़्त आप बहुत सजग होते हैं । सचेत ! उस वक़्त आप कल के बारे में कुछ भी नहीं सोच रहे होते हैं । ना यस्टरडे ना टुमारो, कुछ नहीं होता । क्यों ? क्योंकि वहाँ ख़तरा है । और जहाँ ख़तरा है आपको उस ख़तरे से निपटने के लिए जागना होता है । जब कभी आप ख़तरे में होते हैं आप सो भी नहीं पाते । अब यदि जंगल से हम गुज़रें तो हम देखेंगे की उस वक़्त एक-एक कदम का हमें होश होता है, सुधि होती है । हम देख रहे होते हैं, होश में जागे हुए कि हम चल रहे हैं । यानि जहाँ कही ख़तरा है वहाँ जागरण है । जहाँ कहीं सुरक्षा है वहां बेहोशी है, निद्रा है ।
            सुनसान स्थानों में जब हम ध्यान करते हैं तो एक तो ध्यान करते वक़्त हमें भय पैदा होता है । कारण ये होता है कि ध्यान में हम अकेले होते हैं । हमारे साथ कितने ही लोग ध्यान कर रहे हों लेकिन हमारा आंतरिक जगत सूना ही होता है । वहाँ हम केवल अकेले होते हैं । इसीलिए ध्यान भय पैदा करता है । वो भय है अकेलेपन का । आपने गौर किया होगा कि आप जब कभी भीड़ में होते हैं आप सुरक्षित महसूस करते हैं । भीड़ एक प्रकार की सुरक्षा देती है । और इसके विपरीत जब आप अकेले होते हैं तो ख़तरा होता है । तो ध्यान एक प्रकार का अकेलापन है इसीलिए वो भय पैदा करता है । और यदि ध्यान किसी एकांत इलाक़े में किया जाये तो क्या होगा ? भय दुगना होगा । क्योंकि एक तो बाहरी अकेलापन होगा और एक अंदर का अकेलापन होगा । तो दो भय होंगे – एक आंतरिक, दूसरा बाहरी । यदि हम इस दोहरे भय को नकारात्मक रूप से देखें तो निश्चित ही हम इससे बचना चाहेंगे और हम किसी सुरक्षित स्थान पर चले जायेंगे । लेकिन इसको दूसरे पहलू से भी देखने का प्रयास कीजिये । जब भय होता है तो हमारे प्राण अपनी पूरी उर्जा को एकत्रित करने लगते हैं क्योंकि भय से निपटना है, तैयारी करनी है । तब जो हमारे अचेतन में सोई हुई उर्जा है वो भी अचानक जाग उठती है । पूरी एक-एक कोशिका में, एक-एक अणु में, एक-एक परमाणु में मौजूद जितनी भी उर्जा हम इकठ्ठी कर सकते हैं, हम करने लगते हैं । यही है जागरण । तो जिन साधको ने ये देखा, समझा, जाना कि भय से उर्जा पैदा होती है, उन्होंने एक आध्यात्मिक विज्ञान की बहुत बड़ी खोज की । जो उर्जा भय ने जगा दी है, सक्रिय कर दी है वही उर्जा, वही उर्जा, आनंद में परिवर्तित की जा सकती है ।
            भय जितना गहरा होता है, उर्जा उतनी अधिक एकत्रित होती है और वही उर्जा को यदि हम एक नई दिशा दे दें, ध्यान की दिशा दे दें, जागरण की दिशा दे दें, तो अंदर के आयामों के लिए यात्रा सुलभ हो जाती है ।
            हम ये सभी जानते हैं अपने अनुभवों से कि जिसके जीवन में जितनी पीड़ा, जितनी विपदा, जितना संताप होता है उस व्यक्ति की ग्रोथ की, विकास की उतनी ही अधिक संभावना होती है । केवल पीड़ा ही हमे जगाती है, हमे जीवन के बारे सोचने पर विवश करती है । यदि पीड़ा हो ही ना तो फिर तो हम रटी-रटाई जीवन शैली में घुटते जाते हैं, घुलते जाते हैं, मरते जाते हैं । विपदाएँ, आपदायें, ये सब हमें जगाने का काम करते हैं । भय एक बहुत बड़ा उत्प्रेरक है, बहुत बड़ा परावर्तक है । यही बात ध्यान करते वक़्त हम महसूस करने लगते हैं ।
            दरअसल, हमारी जीवन की जो शैली है उसमें ध्यान करना इतनी मुश्किल इसीलिए हो जाता हो क्योंकि हमने अपने आस-पास सुरक्षा की एक दीवाल खड़ी करके रखी हुई है । हम हर क्षण सुरक्षा में जीना चाहतें हैं । समाज हमें सुरक्षा देता है, परिवार सुरक्षा देता है, सरकारी नौकरी सुरक्षा देती है, पेंशन स्कीम सुरक्षा देती है, लाइफ इन्शुरेंस सुरक्षा देती है । मैं शिक्षक हूँ । मैं बहुत सारे बच्चों से ये बात पूछता हूँ कि जो वो करना चाहते थे अपने जीवन में, जो विषय पढ़ना चाहते थे, क्या वो कर रहे है ? दुर्भाग्यवश 95 प्रतिशत बच्चों का यही जवाब होता है कि नहीं वो वो नहीं कर पाए, जो करना चाहते थे क्योंकि उस विशेष क्षेत्र में, उस विशेष विषय में नौकरी पाने के अवसर कम हैं । यदि हम थोड़ा देर इस पर चिंतन करें तो हम पाएंगे कि हमने अपने आस-पास सुरक्षा की दीवार पैदा कर रखी है । जो व्यक्ति लगातार सुरक्षा के लिए लालायक है, जो सुरक्षा में जी रहा है, वो ध्यान कर ही नहीं सकता । ध्यान और सुरक्षा बिलकुल एक दूसरे के विपरीत है । ध्यान है असुरक्षा, ध्यान है अकेलापन; सुरक्षा है भीड़, ध्यान है अभी नाउ, सुरक्षा है भविष्य ।
            तो जो ध्यान करना चाहता है उसे भय को समझना होगा । भय से मुँह मोड़ने की बजाय उसका सामना करना होगा । उसकी ऊर्जा को एक विधायक दिशा में मोड़ना होगा । इसीलिए जब कभी आपको अवसर मिलता है निर्जन क्षेत्र में जाकर ध्यान करने का तो ज़रुर जाइये और जब भी भय पैदा हो तो उसे देखिये, देखते रहिये । अचानक आप अपने आपको ऊर्जान्वित महसूस करेंगे ।
            और एक बात और याद रखिये : हमारे ज़्यादातर भय तो झूठें हैं । अब सामने सांप हो तो उससे बचने का उपाय करना तो समझदारी है, लेकिन सांप हो ही ना, बस एक कल्पना हो, कल्पना का सांप हो उससे बचने का उपाय करना निरी मूढ़ता से ज़्यादा और कुछ हो भी नहीं सकता । हमारे ज़्यादातर भय ऐसे ही हैं । और एक भयग्रस्त जीवन जीते-जीते हम जीवन की सुंदरता से भी चूक जाते हैं । जैसे कि, हमने एक ऐसे क्षेत्र में ध्यान किया जहाँ हमें पथरीले रास्तों से गुज़रना पड़ा । चट्टानें भी थीं वहाँ । वहाँ तक गाड़ी भी नहीं जा सकती थी । वहाँ नदी का किनारा था । जब हम वहाँ बैठे, धुंधलाई हुई शाम थी और नदी इतनी स्थिर, इतनी ठहरी हुई और हल्का नीला आकाश ! उसमें जब आकाश प्रतिबिंबित हो रहा था तो ऐसा लगा मानो उसमें पिघला हुआ शीशा बह रहा हो । उसमें पूरा का पूरा आकाश और आस-पास के पेड़ पौधे, जो कुछ भी था सब कुछ झलक रहा था ! सबकी छवि दिख रही थी क्योंकि उस पानी में तरंग भी नहीं थी ! जैसे-जैसे अँधेरा हुआ, हमने आँखें बंद की और हमने ध्यान किया । ख़तरा तो वहाँ था क्योंकि जीव जन्तु थे, कीड़े मकोड़े थे, कुछ भी हो सकता था, कुछ भी आपको काट सकता था । लेकिन हमने ये महसूस किया कि ये सारे काल्पनिक भय थे । हर वक़्त मन हमें डरा रहा था, अंदर भय पैदा कर रहा था, हमें ध्यान से बाहर खीचने की चालें चल रहा था । हम इतनी जगह ध्यान करके आये और कभी कुछ भी नहीं हुआ । कुछ भी नहीं । हमें जीवन पर थोड़ा भरोसा करना पड़ेगा, विश्वास रखना होगा कि जीवन हमारी सुधि ले लेता है ।
            और एक बार की घटना है: हम कुछ ध्यानी एक दाहस्थल पर गए । हमारे एक मित्र के पिता जी की मृत्यु हो गई थी । जब तक दाह-संस्कार की तैयारियाँ चल रही थीं, हम दाह-सर के पीछे बने हुए एक छोटे से पार्क में चले गए । ये पार्क एक छोटे से खूबसूरत जंगल में परिवर्तित हो गया था । वहाँ इतनी घनी झाड़ियाँ थीं, पेड़ पौधे थे कि पांच से दस फुट भी आप सीधे-सीधे देख नहीं सकते थे । एक तो शवस्थल, ऊपर से जंगल । और हम अंदर जाते ही गए, जाते ही गए और उसके किनारे पर हमने एक बहुत बड़ा सा गड्ढा देखा जो की दरअसल एक नदी का रास्ता था । पानी नहीं था उसमें । बस हम उस किनारे पर जा के बैठ गए । शांत ! आँखें बंद करके । वहाँ भी जा के हमने यही महसूस किया कि जितना भय होता है उतना आप जाग्रत होते हो । उतना आप नाउ में होते हो, वर्तमान में होते हो । तो याद रखिये: जो जितनी ज़्यादा सुरक्षा में जिएगा, उतना ज़्यादा बेहोश रहेगा । जो सुरक्षा को ढूंढेगा वो सोता रह जायेगा, जो ख़तरे को स्वीकार करेगा, उसका सामना करेगा वो जागेगा, वही जियेगा ।

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