प्रेम का उपहार

प्रेम हमेशा कुछ देना चाहता है । देना प्रेम की सहज प्रवृति है, उसका स्वभाव है । प्रेम हमेशा अवसर तलाशता है, मौक़े ढूंढ़ता है ताकि प्रेमिका को कुछ दिया जा सके : कोई छोटा सा उपहार, कोई फूल, कविता की चंद पंक्तियाँ, एक मीठा सा प्रेम पत्र, कुछ भी…बस देना होता है । हर वक़्त यह देने का भाव उमड़ता रहता है अन्दर । जो कोई भी कभी प्रेम में प्रवेश करता है उसके अन्दर यह देने का भाव प्रस्फुटित हो जाता है । और इस देने में एक गहन आनंद मिलता है । इसीलिए प्रेमी लगातार देना ही चाहता है । यह देने का आनंद आता कहाँ से है ? देने का अर्थ है कि आप “मैं”, “मेरे”, “मुझे” से मुक्त हो रहे हैं । आप आत्म-केन्द्रित नहीं अब । आप किसी और की ख़ुशी में ख़ुश हो पा रहे हैं । यह किसी और की ख़ुशी में ख़ुश हो पाना संकेत है कि आपका विस्तार हो रहा है, आपकी चेतना फैल रही चारों तरफ़, आप बढ़ रहे हैं । और जितना आप विस्तृत होते जा रहे हैं, उतना आपका अहम्, ‘इगो’ मिटता जा रहा है । और जितना आप अहम् से मुक्त होते जाते हैं, उतना आनंद और, और गहरा होता जाता है । इसलिए देने में एक अनोखा आनंद होता है ।
             लेकिन हममें से बहुत सारे लोग यह आनंद नहीं जान पाते, क्योंकि हमारे देने में पाने का भाव बना ही रहता है । फिर देना, देना न होकर निवेश बन जाता है । फिर आप प्रेमी न होकर, व्यवसायी बन जाते हैं । अब, प्रेम व्यवसाय तो है नहीं । इसीलिए यह व्यावसायिक प्रेम दुःख ही देता है । जिस देने में वापस पाने का भाव निहित होता है वह देना दुःख ही देता है क्योंकि ऐसा देना शुद्ध नहीं होता, मिलावटी होता है । और कोई भी मिलावटी चीज़ हमेशा नुक़सान ही पहुँचाती है । तो अपने देने को शुद्ध करें । मुक्त करें उसे सारी लालसाओं से । बस देते ही रहें ।
             और प्रेम का एक ऐसा अद्भुत उपहार है जिसकी कोई तुलना नहीं ! जिस दिन आप किसी को वह उपहार दे पाते हैं आप अनंत आनंद से भर जाते हैं ! और ऐसा उपहार जिसे दिया जाता है वह तो अनंत आनंद से भरता ही है, जो यह उपहार देता है वह भी अनंत आनंद से भर जाता है । वह प्रेम का अंतिम उपहार होता है क्योंकि उस उपहार में उपहार देने वाला ही समर्पित हो जाता है । एक ऐसा ह्रदय जो सारी माँगों, सारी अपेक्षाओं से मुक्त है, जिसे वापस कुछ भी पाने की इच्छा शेष न रही; ऐसा माँगरहित, अपेक्षारहित ह्रदय प्रेम का सबसे सुन्दर उपहार है । यह तो हमें मानो पंख ही लगा देता है ! और हम प्रेम के अनंत आकाश के मुक्त पंछी ही बन जाते हैं । जब तक यह उपहार अपनी प्रेमिका को न दे दिया तब तक कोई तृप्ति नहीं, और जो यह दे दिया फिर कोई प्यास नहीं ।

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