प्रेम क्या है ?

प्रेम शब्दमात्र में ही एक अजीब सी मिठास है, एक अजीब सा सौंदर्य है, एक अजीब सी शीतलता है । प्रेम शब्द सुनने मात्र से ही हमारे प्राणों में एक तरंग उठने लगती है । प्रेम ने जिसे छू लिया वो तो मदहोश ही हो जाता है । और जो प्रेम में डूब गया वो मुक्त हो जाता है ।
क्या है ऐसा प्रेम में जिसका गुणगान सारे बुद्धों ने, सारे संतों ने किया है ? क्या है प्रेम में ऐसा जो हमें इसकी ओर खींचता है ? क्या है प्रेम में जिसके लिए मीरा ने हँसते-हँसते ज़हर पी लिया ? जिसके लिए जीसस सूली पे चढ़ गए या जिसके लिए बुद्ध ने, महावीर ने अनंत यातनाएँ और पीड़ा सहीं ? बाइबिल कहती है कि, “जो प्रेम में वास करता है वो परमात्मा में वास करता है ।” जो प्रेम में हो वो तो किसी और दुनिया का ही लगता है, जैसे कहीं और से आया हो; इस जगत का तो लगता नहीं । लेकिन फिर भी ऐसा प्रेम बहुत दुर्लभ देखने को मिलता है । इतना कम कि कभी-कभी तो हमें ये लगने लगता है कि ये जो बातें हमने सुनी हैं बुद्धों से प्रेम के संबंध में वो कहीं कोरी कल्पना ही तो नहीं हैं ? महज़ किस्से-कहानियाँ ही तो नहीं है ? उसमें कोई सत्य है भी या नहीं है ? फिर हम एक अजीब दुविधा में पड़ जाते हैं: सत्य और कल्पना के द्वंद्व में । हमें ये शंका बार-बार होती है कि, “प्रेम जैसी कोई चीज़ होती भी है या नहीं ?”
इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं है । हममें से हर कोई, कभी ना कभी, कुछ क्षणों के लिए ही सही प्रेम में उतरा ज़रूर है । यदि आपसे अचानक कोई पूछे कि, “आपके जीवन के सबसे सुंदर क्षण कौन से थे, गोल्डन पीरियड, कौन सा था ?” तो आप यही कहेंगे कि, “वही प्रेम के कुछ क्षण जो मैंने जिए, वही सब कुछ था ।” तो प्रेम जैसा कुछ है इसको हमें सैद्धान्तिक रूप से सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है । वो हमारे अंदर है । कुछ ऐसा जो हमें बताता रहता है प्रेम के संबंध में । जो हमें प्रेम की प्यास से भरा रहता है ।
आपने ग़ौर किया होगा कि लगभग सभी लोग प्रेम में डूबते हैं । फिर उन्हें तथा-कथित धोखे मिलते हैं और वो प्रेम से तौबा कर लेते हैं । क़सम खा लेते हैं कि अब प्रेम-गली में दोबारा नहीं जाएँगे । उनके जीवन का ये निष्कर्ष होता है कि प्रेम संताप ही देता है, पीड़ा ही देता है; प्रेम एक छलावा ही है, एक मृगमारीचिका, एक मिराज, जो दूर से तो दिखता है बड़ा सुहावना, बड़ा मधुर, लेकिन अंदर-अंदर बहुत ही कड़वा होता है । ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी है जिन्होंने प्रेम के संबंध में ये निर्णय बना लिए हैं, ये राय बना ली है, ये मत बना लिया है और इसके साथ ही वो जीते रहे हैं । इसका परिणाम क्या हुआ है ? ज़रा उन्हें देखें वो कितने बेजान से लगते हैं । उनके व्यक्तिव में कोई मिठास नहीं, कोई संगीत नहीं, कोई नृत्य नहीं । बोझिल सा एक जीवन है जो ढो रहे हैं । यही इस बात का सबूत है कि जो प्रेम से बचता है, जो प्रेम से चूकता है वो सब कुछ से चूक जाता है । जो प्रेम से डरकर भाग जाता है वो एक प्रकार से आत्महत्या कर लेता है । आत्महत्या यानी आत्मा की हत्या कर लेता है । फिर वो प्राणहीन होता है । शरीर भले जीवित रहे लेकिन आत्मा तो मर ही जाती है । इसीलिए प्रेम से डरना मृत्यु को आमंत्रण देना है ।
लेकिन यहाँ यह प्रश्न उठता है कि लोग प्रेम से डरते क्यों हैं ? वो प्रेम से भागते क्यों हैं ? वो प्रेम से इतनी जल्दी नीरस कैसे हो जाते हैं, थक कैसे जाते हैं ? और इसी प्रश्न के उत्तर में प्रेम का रहस्य छुपा है । हम प्रेम से भागते क्यों हैं ? प्रेम दरअसल अहम् का, अपने-आप का विसर्जन है । जब भी आप प्रेम में होते हैं तो आप नहीं होते हैं । जब भी आप प्रेम में होते हैं किसी के तो धीरे-धीरे आपका जो व्यक्तिव है, आपकी जो आइडेंटिटी है, आपकी जो पहचान है, आपका जो “आई” है वो धीरे-धीरे तिरोहित होने लगता है, ख़त्म होने लगता है । और ख़त्म कहाँ होता है ? आप जिससे प्रेम करते हैं, आप जब उसमें डूबते हैं तो आप नहीं रहते,आप नहीं बचते, केवल प्रेमिका ही बचती है । यही प्रेम का सबसे बड़ा भय है ।
दरअसल अहम् शब्द को हमें बड़े गहराई से समझने की आवश्यकता है । अहम् क्या है ? आमतौर पर अहम् का अर्थ घमंड माना जाता है, या फिर ज़िद या स्वार्थ । ये सारे अर्थ अहम् को परिभाषित करते हैं । लेकिन अहम् इन सबसे बहुत गहरी चीज़ है । अहम् का मतलब है “I”, “मैं” । जब तक आप अपने आप को किसी भी चीज़ से जोड़कर देखते हैं कि आप हिंदू हैं या भारतीय हैं या अमरीकन हैं या किसी एक संस्था के कर्मचारी हैं, ये सारी पहचानें आपके मैं को पैदा करते हैं । आप किसी ना किसी रूप में अपने आप को परिभाषित करते हैं । आप किसी के पिता हैं या पति हैं या पुत्र हैं या बेटी हैं या पत्नी हैं या आप व्यवसायी हैं या शिक्षक हैं, आप किसी ना किसी चीज़ से अपने आप को एक पहचान देते हैं, एक नाम देते हैं । ये सारी पहचानें, ये सारे नाम आपके स्व को, आपके “I” को पैदा करते हैं । जो जितनी अधिक चीज़ों से अपना तादात्म्य स्थापित करता है, अपने आप को जोड़कर देखने लगता है, उसका अहम् उतना ज़्यादा गहरा और जटिल होने लगता है । इसके विपरीत जिसका तादात्म्य जितनी कम चीज़ो से होता है वह उतना अहम् से मुक्त होता है । वह एक शून्यता को अनुभव करता है ।
क्या आपने कभी शून्यता को जाना है ? क्या आप कभी विचारशून्य हुए हैं ? अंदर से बिल्कुल ख़ाली, बिल्कुल मौन ? यदि हाँ, तो उन क्षणों में ही आपने अहम् से पार का कुछ महसूस किया होगा । उन क्षणों में ही आप निरहंकारी बने होंगे । क्या आपने कभी ग़ौर किया है कि जब कभी आप उस चीज़ या व्यक्ति के साथ होते हैं जिसे आप प्रेम करते हैं उस वक़्त आप कुछ भी सोच नहीं रहे होते, आप शून्य होते हैं । प्रेम की पूरी की पूरी जो मिठास है, जो मधुरता है वो इसी बात की है कि प्रेम हमें कुछ क्षणों के लिए शून्य कर देता है और इस शून्यता में ही आप अहम् के पार चले जाते हैं ।
लेकिन इस शून्यता का एक और पहलू है, वो ये कि यह शून्यता बड़ी डरावनी होती है । हम एक अकेलेपन से भर जाते हैं और इससे हम बचने का प्रयास करते हैं । अब चूँकि इस शून्यता को हम सीधे-सीधे देखते नहीं, हम डरते हैं इससे, इसीलिए हम इसे समझ भी नहीं पाते । जैसे ही ये शून्यता आती है अंदर की, ख़ालीपन, हम भागने लगते हैं, बेचैन हो उठते हैं और अपने आप को किसी चीज़ से भरने लगते हैं । चाहे संगीत सुनना हो, चाहे किसी से बातचीत करनी हो, चाहे कुछ पढ़ना हो । जितना भरते जाते हैं उतना हमारा अहम् पोषित होता जाता है, उतना अहम् मजबूत होता जाता है । और जितना अहम् मजबूत होता है, जितना हम अहम् से भरे होते हैं, उतना कम स्थान प्रेम के लिए हमारे अंदर मौजूद होता है । हम सभी ने ये बातें सुनी हैं और कहीं भी हैं एक दूसरे से कि प्रेम में अहम्, ईगो नहीं होना चाहिए । लेकिन हम इसे समझते ही नहीं कि अहम् है क्या । अहम् है किसी भी चीज़ से अपने आप को भरना, किसी भी चीज़ से । और अहम् से मुक्ति का सीधा सा अर्थ है शून्यता । जब आप बिल्कुल मौन होते हैं, अंदर एक भी तरंग नहीं होती किसी भी विचार की, किसी भी भाव की, आप जब बिल्कुल ख़ाली होते हैं अंदर से, बस वही है अर्थ अहम् से मुक्त होने का ।
जब तक हम इस शून्यता को आत्मसात नहीं कर लेते तब तक तो प्रेम पीड़ा ही देगा । तथाकथित प्रेमी हमेशा एक विरोधाभास में फँसे होते हैं । इसे ध्यान से समझिए : आप किसी से क्यों प्रेम करते हैं ? अपने आप से पूछिये । आप प्रेम करते हैं क्योंकि आप अपने आप से बचना चाह रहे हैं । आप ख़ाली हैं, डरे हुए अपने आप से, तो किसी और से अपने आप को भरना चाहते हैं । अब जितना आप अपने ख़ालीपन से डरेंगे, जितना आप अपने आप को किसी चीज़ से भरेंगे उतना आप अहंकार से भरते जाएँगे, उतना आप अहंकारी होते जाएँगे । और जितने ख़ाली होंगे, उतने प्रेमी होंगे । तो लोग जब किसी से प्रेम करते हैं तो आम तौर पर होता तो यही है कि उस व्यक्ति से वे अपने ख़ालीपन को लगातार भरते रहते हैं । और प्रेम क्या है ? प्रेम है ख़ाली हो जाना । प्रेम है अगले व्यक्ति में डूब जाना, प्रेम है सामने वाले में, अपनी प्रेमिका में विसर्जित हो जाना । और हम क्या कर रहे होते हैं ? हम सामने वाले को अपने अंदर डुबो रहे होते हैं, सामने वाले से अपने आपको भर रहे होते हैं । करना है सामने वाले में अपने आप को ख़ाली, सामने वाले में अपने आप को उढ़ेल देना है । प्रेम है, विलीन हो जाना सामने वाले में, इतने कि आप बचें ही ना । आप एक शून्यता बन जाएँ । प्रेम का अर्थ ही है शून्य हो जाना । लेकिन हम उल्टी दिशा में चल रहे हैं । होना है ख़ाली और बस भरे जा रहे हैं हम अपने आप को । तो इसमें आश्चर्य क्या है कि हमें पीड़ा ही मिलती है ? जो उल्टी दिशा में चल रहा हो, जो नदी के विरोध में चल रहा हो, उसी पीड़ा तो होगी ही ।
तो पीड़ा कभी प्रेम से नहीं आती, पीड़ा हमारी नासमझी से आती है । आपने ये शेर ज़रूर सुना होगा, “ये इश्क़ नहीं आसाँ बस इतना समझ लीजे / एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ।” एक तो आग का दरिया और उसमें भी डूबना है । हम तो पानी में भी डूबने की हिम्मत नहीं कर पाते । एक तो डूबना है वो भी आग में, ये इश्क़ नहीं आसाँ । जो डूब पाएगा इस आग में वो देखेगा कि इस आग में नष्ट कुछ भी नहीं होता । प्रेम की अग्नि में जो कुछ सच्चा है, जो कुछ खालिस है, वो कभी नहीं जलता । बस जो कचरा है, नासमझी का कचरा, हमारे भ्रमों का कचरा, भ्रांतियाँ हैं उनका कचरा, वो जल जाता है । जो हमने प्रेम के ऊपर अपने अर्थ थोपे हुए हैं वो जल जाते हैं । और जब ये सब जल जाते हैं, तो जो बचता है वही प्रेम होता है । जीसस ने आग से बपतिस्मा लिया था । आग की दीक्षा ली थी जॉन से । आग से गुज़रे थे इसीलिए जान पाए कि प्रेम क्या होता है ।
सूफ़ियों ने इस प्रेम को जाना है । किसी सूफ़ी फ़क़ीर ने कहा है- “तुझ हरजाई की बाँहों में और प्रेम परीत की राहों में / मैं सब कुछ बैठी हार वे ।” सब कुछ ही तो हार देना होता है, जो कुछ भी है । अहम् को हार देना होता है । याद रखिए, सब कुछ हारने का अर्थ यहाँ बाहरी चीज़ों से नहीं है, दुनिया की चीज़ों से नहीं है । जो वैराग्य है, ये जो त्याग है वो अहम् का है, अंदर का, अपनी सारी पहचानों का । क्योंकि बाहर आप.कुछ भी छोड़ दें, अंदर-अंदर तो आप एक अहम् से भरे ही हुए हैं । तो “सब कुछ बैठी हार वे” । इक़बाल साहब ने कहा है कि “ये बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहे लग दो डर कैसा ।” तो इश्क़ तो सबसे साहसी लोगों के लिए होता है । ये हर साधारण व्यक्ति नहीं जान सकता । क्षमता सभी में होती है लेकिन इस ऊर्जा को, इस क्षमता को सही दिशा में ले जाने का साहस, समझ, मार्गदर्शन बहुत ज़रूरी होता है । सब कुछ हारना होता है, बिना डरे । जब आप ये बाज़ी लगा रहे होते हैं तो ये सोच नहीं रहे होते कि अब सब कुछ लगा दिया है, अब कुछ मिलेगा । ये जो आशा है कुछ वापस पाने की, इसकी भी बाज़ी लगानी है, इसका भी दाँव लगाना होता है । ये जो छुपी-छुपी सी हमारे अंदर एक आस बच जाती है इसको भी त्यागना होता है । क्योंकि आप सब कुछ दाँव पर लगा भी दें तब भी आप ये आशा तो बचा ही लेते हैं । तो सब कुछ का अर्थ है सब कुछ । इतना शून्य हो जाना कि बस आप हो ही ना, बस सामने वाला ही हो । “राँझा राँझा करदी वे मैं आपे राँझा होयी ।” बस फिर राँझा ही बचता है, हीर बचती ही कहाँ है ? “राँझा-राँझा करदी वे मैं आपे राँझा होयी”। जब तक हीर राँझा ही न बन जाए और राँझा हीर ही न बन जाए तब तक प्रेम हुआ ही नहीं ।
ये बड़े प्यारे शब्द हैं, बड़े सुंदर गीत हैं, जिन्होंने जाना, किसी हीर ने जाना होगा, जिसकी आत्मा से ये महासंगीत, ये बेजोड़, अद्वितीय काव्य हमारे पास आया । गोपियों ने भी कृष्ण में अपने आपको विलीन कर दिया था और ये विलीन होना ही प्रेम का पहला लक्षण है । जो विलीन होने लगा है वो जान ले कि उसे प्रेम होने लगा है । जो विलीन नहीं हुआ, जिसने अपने आप को बचा लिया, जो सुरक्षा में जीने लगा, जो डर से भागने लगा, जो अपने आप को विसर्जित करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है, वो प्रेम को कभी नहीं समझ पाएगा । बस आपने प्रेम को जाना या नहीं इसका सीधा सा एक लक्षण ये है कि आप शून्य हो गए । लगा दी बाज़ी आपने आपके अहम् की । इक़बाल आगे कहते हैं : “जो जीत गए तो बात ही क्या ! हारे भी तो बाज़ी मात नहीं ।” शायर यहाँ शब्दों में उलझ गया । जिसने स्वयं की बाज़ी लगा दी वो न तो जीतता है, न हारता है । वो तो हार-जीत के पार होता है । प्रेम हार-जीत के पार होता है । जिसने स्व का ही दाँव लगा दिया हो वो जीतेगा कैसे ? वहाँ जीतने वाला है ही कहाँ ? वो हारेगा भी कैसा ? वहाँ हारने वाला भी कहाँ है ?
उतरिये इस प्रेम में, उतरिये इस शून्यता में, फिर आप जानेंगे अनंत आनंद को । ओशो कहते हैं कि प्रेम आपसे वो ले लेता है जो आपका था ही नहीं और आपको वो दे देता है जो आपके पास सदैव मौजूद ही था । वो सदैव मौजूद चीज़ और कुछ नहीं बस शून्य आनंद है ।

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