लम्बी दूरी के प्रेम संबंध असफल क्यों होते हैं?

ऐसा माना जाता है कि लंबी दूरी के प्रेम संबंध ज़्यादा देर नहीं चलते, उनकी आयु बहुत कम होती है क्योंकि दूरी अधिक होने पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है । संपर्क भी कम होने लगता है । प्रेमी आपस में मिल भी नहीं पाते । इसके कारण प्रेम धीरे -धीरे कम होता जाता है, क्षीण होता जाता है । दो प्रेमी ऐसे होते हैं जैसे दो ग्रह हों : जब तक वे एक दूसरे के पास होते हैं, एक दूसरे के प्रेम गुरुत्व के प्रभाव में होते हैं । लेकिन जैसे ही दूरी बढ़ती है, गुरुत्वाकर्षण ख़त्म होने लगता है, और फिर वे एक दूसरे से अलग हो जाते हैं । यदि यह सोच सही है तो इसके विपरीत कम दूरी के प्रेम संबंध ज़्यादा चलने चाहिए । लेकिन क्या ऐसा होता है? नहीं होता । अपने आसपास एक नज़र भर कर देखिए : आप पाएँगे कि वे प्रेमी जो एक दूसरे के पास हैं, वे भी एक दूसरे से उतने ही परेशान होते हैं । कम दूरी के प्रेम संबंधों की सफलता का जो अनुपात है, प्रतिशत है वह बिल्कुल उतना ही होता है जितना लंबी दूरी के प्रेम संबंधों में होता है ।
            दरअसल, दूरी को हम किस रूप में देखते हैं यह समझना सबसे पहले ज़रुरी है । दूरी प्रेम के संदर्भ में भौतिक नहीं हो सकती क्योंकि जो पदार्थ पर ही अटक गया है उसने प्रेम को अभी जाना ही नहीं । प्रेम देह से शुरू अवश्य होता है लेकिन वहाँ रुकता नहीं है, आगे बढ़ता है । प्रेम में शारीरिक दूरी, फ़िज़िकल डिस्टेंस बिल्कुल ही महत्वहीन होती है । चूँकि हममें से ज़्यादातर लोग शरीर के ऊपर जा ही नहीं पाते, इसीलिए मन हमारे साथ कम दूरी, अधिक दूरी की चालाकियाँ करता रहता है और हम देख ही नहीं पाते । या फिर हम देखना ही नहीं चाहते । क्योंकि जैसे ही हम देखना शुरु करते हैं तो सबसे पहले हमें यह महसूस होना शुरु होता है कि हम ग़लत हैं, हममें ही कुछ कमी है, हम ही चीजों को सही दृष्टिकोण से देख नहीं पा रहे । और क्योंकि हममें से कोई भी यह स्वीकार नहीं करना चाहता कि वह ग़लत है, इसका परिणाम यह होता है कि सीधी सी, स्पष्ट दिखने वाली चीज़ भी हम अनदेखा करते हैं । हम कहते हैं कि लंबी दूरी के प्रेम संबंध इसलिए असफल होते हैं क्योंकि दूरी बहुत है । और फिर वही लोग जो दूरी से परेशान थे, लंबी दूरी की पीड़ा से ग्रस्त थे, वे ही जब पास आ जाते हैं, तब भी परेशान होते हैं क्योंकि फिर घुटन शुरू होती है । तो हम चाहते क्या हैं हम यही नहीं जानते । वैसे भी शायद हमारी आकांक्षा है एक नियत निश्चित संतुलित दूरी की – न बहुत पास, न बहुत दूर ।
            लेकिन प्रेमी, जो सच्चे प्रेमी होते हैं, वे तो और, और, और पास आना चाहते हैं एक दूसरे के क्योंकि प्रेम का अर्थ ही है डूबना, प्रेम में डूबना । तो जिसमें आप डूबने ही वाले हो, यदि आपकी नियति, आपका गंतव्य डूबना ही है तो उसके पास जाने पर प्रतिकर्षण कैसे हो सकता है? शायद हम वैज्ञानिक प्रेम चाहते हैं, न्यूटन वाला प्रेम । न्यूटन कहते हैं कि जब दो कण एक-दूसरे से दूर होते हैं, तो वे एक दूसरे को आकर्षित करते हैं, लेकिन जब एक दूसरे के पास होते हैं तो उनके बीच प्रतिकर्षण शुरू होता है । तो हमें यही लगता है कि पास आए तो प्रतिकर्षण होगा, दूर गए तो आकर्षण होगा । तो यही खेल खेलते रहते हैं : कभी पास आये , कभी दूर गए, कभी पास आए, कभी दूर गए । लेकिन प्रेम Newtonian नहीं होता । प्रेम कोई वैज्ञानिक चीज़ नहीं है, प्रेम भाव के स्तर पर किया जाता है । एक बड़ा सुंदर सा शेर है – मेरे पास मेरे हबीब आ / ज़रा और दिल के क़रीब आ / तुझे धड़कनो में बसा लूँ मैं / कि बिछड़ने का कभी डर न हो । यह है प्रेम । पास, और पास, इतनी पास की प्रेमिका धड़कन ही बन जाए, धड़कने ही लगे अंदर । और इतनी आवश्यक हो जाए कि बिना उसके तो ऐसे लगे जैसे हृदय धड़कना ही बंद कर देगा । तो यह तो हुआ प्रेम में डूबना । और यदि प्रेम की परिणीति डूबना ही है तो फिर पास आने से प्रतिकर्षण क्यों होता है? और क्योंकि पास आने से प्रतिकर्षण होता है उसी का परिणाम है कि दूर जाने पर आकर्षण शुरू होता है । तो यह आकर्षण और प्रतिकर्षण का जो खेल है, जो द्वंद है इसमें कभी प्रेम पनप ही नहीं सकता, प्रेम कभी अंकुरित नहीं होता क्योंकि दूरी हमेशा शरीर के स्तर पर ही होती है, भाव के स्तर पर कभी कोई दूरी नहीं होती । आप ग़ौर करके देखें कि आपके दादा या दादी, जिनको आपने बहुत गहराई में प्रेम किया और मान लो उनकी मृत्यु हो गई, तो क्या उनकी मृत्यु के बाद वह प्रेम संबंध समाप्त हो गया ह? यदि आपने वाक़ई प्रेम किया था तो फिर फ़र्क़ ही नहीं पड़ता वे कितनी दूर हैं । प्रेम तो वही का वही है । और फिर यदि हम प्रेम में बहुत गहरे जाएँ तो मेरे पास मेरे हबीब आ / ज़रा और दिल के क़रीब आ / तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं… । इससे भी गहरे : जब राधा कहती है : श्याम श्याम रटत रटत राधा श्याम हुई / सखियों से पूछन लगी राधा कहाँ गई । फिर धड़कनो से भी काम नहीं चलता । फिर तो राधा श्याम ही बन जाती है ।
            हमारी दुविधा यही है कि हम ये सारी बातें सुनते हैं, ये गीत सुनते हैं और इनमें निहित आनंद को पाना चाहते हैं, वह आनंद जो मीरा ने जाना, राधा ने जाना । हम सभी के अंदर उस प्रेम को पाने की प्यास होती है । कौन नहीं पाना चाहता वह गहराई प्रेम की? लेकिन हम फिर प्रेम को शरीर तक ही सीमित कर देते हैं । मैं यह बात बार-बार दोहराता हूँ कि शरीर के प्रेम में कोई भी बुराई नहीं है । लेकिन वहाँ अटक जाना, रुक जाना, यही पीड़ा देता है । वह तो बस शुरुआत है । अभी तो आगे जाना होता है, धड़कन में बसना होता है और श्याम बनना होता है । लेकिन क्योंकि हम यह नहीं कर पाते इसीलिए हम बड़ी आसानी से आकर्षण और प्रतिकर्षण की दुविधा में फँसे रह जाते हैं ।
            तो इस बात को हमें स्पष्ट रुप से समझना होगा कि प्रेम जितना गहराता है, एक प्रेम संबंध जितना खिलता जाता है, दूरी उतनी मिटती जाती है, प्रेमी उतने एक दूसरे के पास आते जाते हैं । और एक क्षण आता है जब वे इतने पास होते हैं कि दूरी रह ही नहीं जाती । और यह दूरी का मिटना शरीर के स्तर पर नहीं होता, क्योंकि शरीर के स्तर पर तो दूरी होगी ही । आप किसी के अंदर प्रवेश नहीं कर सकते । कैसे करेंगे? शरीर के स्तर पर तो दूरी रहेगी ही । दूरी नहीं रहती इसका अर्थ है कि दूरी का भाव समाप्त हो जाता है । दूरी शब्द आपके शब्दकोश से बाहर निकल जाता है क्योंकि आप फिर अपने प्रेमी को या प्रेमिका को हमेशा महसूस कर पाते हैं । शारीरिक रूप से नहीं, आप उसे शरीर के ऊपर का कोई तल जिसे परिभाषित करना मुश्किल है, बस एक उपस्थिति है, बस वह आप महसूस करते हैं । हर एक क्षण । कहीं भी । और यह महसूस करना याद के रूप में भी नहीं होता । थोड़ा ध्यान रखें : आप याद कर करके किसी को प्रेम नहीं कर सकते क्योंकि याद करना भी मन से ही संबंधित होता है, याद करना भी छवियों से संबंधित होता है । आप अपनी प्रेमिका की छवि अपने मन में लाते हैं और उसे जी रहे होते हैं । तो वह भी शरीर की ही छवि है । इमेज क्या है? शरीर का ही तो एक छायाचित्र है, फोटोग्राफ है । तो शरीर न वास्तविक रूप में, न छवि के रूप में मौजूद होता है । बस आप एक उपस्थिति महसूस करते हैं । बस होते हैं । और बस आपकी प्रेमिका भी होती है, बस एक अदृश्य मौन, शांत उपस्थिति । और जिस दिन यह बात महसूस हो जाती है उस दिन न केवल लंबी दूरी के प्रेम संबंध बल्कि कम दूरी के प्रेम संबंध ये सारे के सारे शब्द समाप्त हो
जाते हैं ।

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