ढाई अक्षर प्रेम के

कबीर का एक बहुत सुंदर और लोकप्रिय दोहा है : पोथी पढ़ी-पढ़ी जग मुआ पंडित भया ना कोय / ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय । इस छोटे से दोहे में जीवन का गहनतम ज्ञान है । कबीर ने इस दोहे के माध्यम से यह ज्ञान दिया है कि जिसने प्रेम को चखा उसे कुछ और जानना शेष न रहा, जिसने प्रेम रस पी लिया उसकी कोई प्यास न रही, जो प्रेम में डूबा उसने परम ज्ञान को पाया । कबीर के लिए प्रेम ही ज्ञान है और प्रेमी ही ज्ञानी है; और जो अप्रेमी है वह अज्ञानी है ।
            यदि हम इस दोहे को गहराई में देखें तो हम यह कह सकते हैं कि मनुष्य के द्वारा रचित जो भी साहित्य है,जो भी दर्शन शास्त्र हैं, जो भी विज्ञान की समझ है, खोज है, वह सब कुछ प्रेम के सामने फीका पड़ जाता है । कुछ लोगों को यह बात अतिशयोक्ति लगेगी । प्रेम जैसी साधारण सी चीज़, जो की हमें लगता है हम सब जानते हैं, परम ज्ञान कैसे हो सकता है ? और कैसे इसको जानने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रहता ? उन्हें ऐसा लगता है कि उन्होंने भी प्रेम को जाना है, लेकिन जीवन के सम्बन्ध में जो उनके प्रश्न हैं, जो उनकी जिज्ञासा है वह समाप्त तो नहीं हुई, वह तो वही हैं; फिर कैसे प्रेम हर एक प्रश्न का उत्तर बन सकता है ?
            दरअसल हममें से बहुत-बहुत विरले लोग ही प्रेम को जानते हैं । हमारी प्रेम के सम्बन्ध में जो समझ है वह ज़्यादातर वैचारिक स्तर पर या ज़्यादा से ज़्यादा भाव के स्तर तक सीमित है । हमने प्रेम के बारे में कुछ धारणाएँ बना ली हैं, और उन्हें हम जीते रहते हैं । दरअसल, हम प्रेम को न जी कर उसकी धारणा को जीते हैं, उसके विचार को जीते हैं । हम प्रेम में नहीं होते, हम प्रेम की कल्पना में होते हैं । आप ग़ौर करके देखें : आपमें से ज़्यादातर लोगों की प्रेम के सम्बन्ध में जो समझ है वह साहित्य से उपजी हुई है । प्रेम कहानियाँ पढ़ी है आपने, फ़िल्में देखी है, प्रेम पर चर्चा सुनी है; और फिर आपको लगने लगा कि आपने प्रेम जान लिया है । कितनी कहानियाँ हैं प्रेम के सम्बन्ध में, कितनी फ़िल्में बनी हुई हैं ! उन्हें देख-देख कर हमें ऐसा अंदाज़ा होने लगता है कि जैसे हम प्रेम समझ गए । और उन कहानियों को पढ़ कर हमें आदर्श प्रेम का पता लगता है जो कि हमने अपने जीवन में कभी जिया ही नहीं; बस हमें ऐसा लगता है कि हम अभागे थे इसलिए हम इसे नहीं जी पाए, हमें कोई नहीं मिला प्रेम करने वाला या ऐसा कोई जिसे हम प्रेम कर सकें । लेकिन, जिन्होंने ये कहानियाँ लिखी हैं, ये फ़िल्में बनाई हैं वो कितने प्रेमी लोग होंगे, उनके जीवन में कैसा प्रेम बरसा होगा कि जिससे प्रेरित होकर उन्होंने ये रचनाएँ कीं !
            कभी मौक़ा मिले तो ऐसे लोगों से मिलकर देखें । आप इनके जीवन में कोई प्रेम नहीं देखेंगे । इनके जीवन भी उतने ही ख़ाली हैं, उतने ही रुखे हैं, रंगहीन हैं । ये सारी कहानियाँ महज कल्पनाओं से उपजी हैं । आपके पास भाषा हो, कल्पना-शक्ति हो, तो प्रेम आसानी से पैदा हो जाता है । कहानियाँ ही लिखना है, कल्पनाएँ ही करना है, कुछ भी कर लो, कौन रोक रहा है ? और फिर कल्पनाओं में जितनी पीड़ा झेलना, बलिदान करना, जितना त्याग करना हो प्रेम के लिए, जितनी प्रतीक्षा करनी हो प्रेमिका की २० साल, ४० साल करते रहो; कल्पना ही तो है ।
             इस काल्पनिक जगत में जीते-जीते हमें ऐसा लगने लगता है कि हमें प्रेम की समझ आ गई है ।
            हमें यह भी लगने लगता है कि इतने लोग प्रेम कहानियाँ लिख रहे हैं, शायरी लिखी जा रही है, फ़िल्में बन रही हैं प्रेम पर तो कहीं तो होगा प्रेम । एक बहुत बड़े फ़्रांसीसी दर्शनशास्त्री हैं एलिन बेदियो । उन्होंने प्रेम पर एक किताब लिखी है । बेदियो का कहना है कि, “जो लोग कहते हैं कि इस जगत् में प्रेम नहीं है उन्हें यह देखना चाहिए कि इतना साहित्य है प्रेम के ऊपर, इतनी फ़िल्में है प्रेम के उपर, इतनी संगोष्ठियाँ, इतने कवि सम्मेलन होते हैं । प्रेम है कहीं तभी यह सब आ रहा है ।” लेकिन यह ज़रूरी नहीं है कि जिसके सम्बन्ध में साहित्य लिखा जा रहा हो, जिसके सम्बन्ध में लोग चर्चा कर रहे हों वह उनके अनुभवों से ही आ रहा यह । यह उनके जीवन की एक प्यास भी हो सकती है, एक कमी–उन्हें प्रेम नहीं मिला, उन्हें कोई प्रेमिका नहीं मिली इसलिए उन्हें सब कल्पना में जीना होता है जो उन्हें वास्तविकता में नहीं मिला ।
            तो यह जो समझ हमारी है प्रेम की वह भ्रमित है, अधूरी, अपरिपक्व, काल्पनिक । ऐसा प्रेम हमें तृप्ति तो देता नहीं कभी । और हमें कबीर के वचन समझ भी नहीं आ सकते क्योंकि कबीर के वचन सच्चे, प्रमाणिक, अनुभवी हृदय से निकले हैं । एक अनुभवी हृदय ही उनके वचनों को समझ सकता है ।
            आपने प्रेम का अनुभव किया है क्या ? प्रेम में आप डूबे हैं कभी आप ? ध्यान रखें : अनुभव और कल्पना दोनों अलग-अलग हैं । मैं यह नहीं पूछ रहा हूँ कि आपने प्रेम के सम्बन्ध में विचार किया है । मैं पूछ रहा हूँ कि आप सीधे-सीधे प्रेम में डूबे हैं कभी । शायद नहीं । आपने प्रेम को साहित्य मान रखा है । एक बार मेरे पास एक छात्रा आई और उसने कहा, “सर, यह फ़िल्म देखिए, आपको अच्छी लगेगी ।” फिल्म का नाम था द फ़ॉल्ट इन अवर स्टार्स । मैंने कहा, “क्या है अनोखा इसमें ?” तो उसने कहा कि, “इसमें दो लोगों की कहानी है, प्रेम कहानी । प्रेमी बीमार हो जाते हैं, असाध्य रोग है; उनकी मृत्यु होने वाली है किन्तु फिर भी वे प्रेम करते रहते हैं ।” मैंने उससे कहा कि, “कब तक ये फ़िल्में देखते रहोगे ।
            यह सब कल्पना है । ऐसे लोगों से मिलो, उन्हें ढूँढो जिन्होंने वाकई ऐसा प्रेम किया है । इस दुनिया में होंगे ऐसे लोग; उन्हें मिलो और उनसे जानो सच में प्रेम करने के लिए कितना साहस, कितनी हिम्मत, कितना धैर्य चाहिए होता है । यह वही लोग बता सकते हैं जिन्होंने सच में जिया है । बस जिन्होंने मनगढ़ंत कहानियाँ लिख दीं–ठीक है, ऐसी कहानियाँ, फ़िल्में मनोरंजन के लिए तो ठीक हैं– लेकिन हम इन्हें सच्चाई मानने लगते हैं । और ऐसा करते-करते हमारा प्रेम भी मनगढ़ंत बन जाता है, मन का गढ़ा हुआ; जिया हुआ नहीं, बस मन का गढ़ा हुआ प्रेम ।
            जब तक हम प्रेम को उसकी सच्चाई में न जान लें तब तक कबीर को समझना असम्भव है । तो साहस करना होता है चीज़ो को जानने के लिए, आनन्द को जानने के लिए । मुझे एक घटना याद आती है : मेरे घर से ५० किलोमीटर दूर एक एक झरना है जो कि बरसात के मौसम में बहुत जीवंत हो जाता है । हम कुछ लोग एक बार वहाँ गए । घनघोर बारिश हुई थी तो झरना अपनी मस्ती में बह रहा था । ४०-५० फुट नीचे नदी का मुहाना था । हम वहाँ नीचे उतरकर कुछ समय बिताने चाहते थे । वह प्रसिद्ध स्थान नहीं है, तो ज़्यादा लोग वहाँ जाते नहीं । दूसरे, वह पर्यटन स्थल नहीं है तो वहाँ नीचे उतरना मुश्किल काम था, वहाँ सीढियाँ नहीं बनी थीं । और पानी गिर गया था इसलिए मिट्टी मुलायम हो गई थी । साथ ही, फिसलन थी, चट्टानों में काई लगी हुई थी, आस पास सैकड़ों कीड़े-मकोड़े थे, गिरगिट और साँपों के होने की सम्भावना थी । अब हमारे पास यही विकल्प था कि हम इन सारी अड़चनों से जूझें और नीचे उतरें, नहीं तो दूर से ही कल्पना करें कि झरने के नीचे नहाने का क्या आनन्द आता है । हमने हिम्मत की, उतरे नीचे धीरे-धीरे ,बड़ा दुरूह था मार्ग । जहाँ पैर रखते थे तो कभी-कभी पैर फिसल जाता था । जो हमारा साथी सबसे नीचे था उसे लगता था कि कहीं कोई चट्टान उसके ऊपर आकर न गिरे । या हो सकता है उसके पीछे आने वाले उसके मित्र फिसल कर गिर जाएँ । लेकिन धीरे- धीरे धैर्य से हम नीचे उतरते गए । और जैसे ही उतर कर हम झरने के पास पहुँचे दिल बस खिल उठा ! झरने की मदमस्त करने वाली आवाज़ ! चट्टानों में गिरता पानी ! और बस हम उस झरने में उतर गए । काफ़ी देर तक उस झरने के नीचे बैठे रहे । बारिश हो सकती थी क्योंकि घने बादल छाए थे । बारिश शुरू हो जाती–जंगल की बारिश–तो वापिस चढ़ना मुश्किल हो जाता । लेकिन फिर भी हम नीचे ही रहे । हमें उस दिन अवर्णीय तृप्ति मिली । हमने देखा चट्टान के ऊपर से कुछ लोग हमारी तस्वीरें ले रहे थे । ये वही लोग हैं जो प्रेम के झरने तक उतरने की हिम्मत नहीं करते । दूर से ही प्रेम को जीते रहते हैं । जोख़िम नहीं लेना चाहते, ख़तरे नहीं उठाना चाहते । तो दूर से ही वे हमारी फोटो खींच रहे थे । वे यह सोच रहे होंगे कि, “काश हम उतर पाते नीचे ! हम भी आनन्द उठा पाते !”
              प्रेम के सम्बन्ध में भी हमारा यही रवैया है । हम दूर से ही प्रेमियों की फोटो खींचते रहते हैं । और उनको देख कर, उस कल्पना में उतर कर हमें लगता है कि हमने प्रेम को जान लिया । इसलिए कबीर हमें समझ नहीं आते, क्योंकि दूर से किसी को देख लेना नहाते झरने में उससे आपको शीतलता कभी नहीं मिल सकती । हमने यदि प्रेम को जाना नहीं है, उस झरने में उतरे ही नहीं हैं तो कबीर को समझ पाना मुश्किल है । लेकिन जो उतरे हैं, उन्हें पता है कि कबीर क्या कह रहे हैं ।
            कबीर कहते हैं कि ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय । जिसने प्रेम को जाना उसने सब कुछ जाना । इसका अर्थ क्या है ? इसका अर्थ यह है कि जिसने प्रेम को जाना उसकी आँखें भी प्रेम की हो जाती हैं, और जो कुछ वह देखता है प्रेम की आँखों से देखता है । फिर कोई दुश्मन नहीं होता, शत्रु नहीं होता । जहाँ कहीं तक नज़र जाती है प्रेम ही प्रेम होता है क्योंकि प्रेम तो उसकी आँखों में है । जहाँ तक भी वे आँखें मुड़ती है वहीं प्रेम दिखता है । फिर कोई द्वेष नहीं, कोई ईर्ष्या नहीं । जब द्वेष नहीं, घृणा नहीं, ईर्ष्या नहीं, तब संताप कैसा ? जो प्रेमी होता है फिर वो प्रेम के कानों से सुनता है, और जो प्रेम के कानों से सुनता है उसे सब कुछ मधुर ही लगता है, सब कुछ मीठा सा । फिर कड़वाहट होगी कहाँ ? जितनी भी कड़वाहट है दुनिया की प्रेम में घुल कर सब कुछ मीठा ही हो जाना है । मीरा ने भी यही किया । जब उन्हें ज़हर का प्याला दिया गया तो उन्होंने ज़हर पी लिया । और कहते हैं कि इतना प्रेम था अन्दर, इतनी शांति कि प्रेम की मिठास से अन्दर का ज़हर भी अमृत बन गया ।
            जो प्रेमी होता है उसका कान, आँख, पूरा व्यक्तित्व ही प्रेमपूर्ण हो जाता है । फिर उसे दिखता है कि यहाँ कुछ जानने लायक है ही नहीं, यहाँ सबकुछ मौजूद हैं । जो देख पाए प्रेम की आँखों से, समझ पाए प्रेम की अंतर्दृष्टि से उसे इस जगत् के रहस्य–गहनतम् रहस्य जिन्हें खोजते-खोजते विज्ञान को सदियाँ लग गई हैं, दर्शनशास्त्रियों को सदियाँ लग गई हैं: “जीवन क्या है ?” “मृत्यु क्या है ?” “हम कहाँ से आए ?” “क्यों आए ?”–ये सारे प्रश्न प्रेम के एक क्षण में समझ आ जाते हैं । इस जगत् का पूरा ज्ञान जो आज तक खोजा गया है वह प्रेम के एक क्षण में उपलब्ध हो जाता है ।
            इसलिए कबीर प्रेम को इतना ऊँचा स्थान देते हैं । और जो इस प्रेम की आँखों से इस जगत को देखता है उसे यह जगत एक दिखता है–अविभाजित । कोई विभाजन नहीं, कोई अलग नहीं; सब एक समष्टि के हिस्से हैं । यह एकलयता ही तो परम ज्ञान है । यह जान पाना कि मुझमें सब हैं, और सबमें मैं हूँ । यह जान पाना ही परम ज्ञान है । अंतिम, अलटिमेट । कबीर ने प्रेम से इस परम ज्ञान को, इस अद्वैत एकलयता को जाना है । और जिस क्षण आप उसे जानेंगे आप भी यही कहेंगे : ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय ।

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