निशा का उदय

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एक बार की घटना है: मैं एक निर्जन क्षेत्र में ध्यान कर रहा था । पेड़ की निस्तब्ध छाँव के तले ध्यान की धुन में बैठा । ठंड के दिन थे । हर एक चीज़ मानो सर्दी में ठिठुर रही थी । और अँधेरा उन्हें अपने आग़ोश में लिए बैठा था । अँधेरा गहराता जा रहा था और साथ ही आसपास का मौन भी गहराता जा रहा था । कुछ वक़्त गुज़रा और अचानक मैंने देखा कि पेड़ के सामने की जो छोटी सी पहाड़ी थी उसके पीछे से चाँद उदित हो रहा था । सफ़ेद चाँद अपनी किरणें चारों ओर बिखेर रहा था और उसका प्रकाश सीधे मेरे चेहरे पर पड़ रहा था । इतना मनोरम दृश्य ! बस मैं उसमें डूब ही गया ! जैसे-जैसे समय बीतता गया, चाँद खिलता ही गया और ऐसा लगा मानो उसने अपनी कोमल बाँहों में अँधेरे को भर लिया हो । और हम सभी पेड़-पौधे, जीव-जंतु मानो शशि और तमस के इस मिलन के साक्षी थे । फिर धीरे-धीरे ऐसा लगा जैसे हम इस मिलन के हिस्से ही बन गए । तभी इस रस में डूबे-डूबे अंतर्दृष्टि का एक मोती मिला । अचानक मैंने देखा कि पहली बार मैंने रात को उदित होते हुए देखा है । क्योंकि आमतौर पर हम रात के बारे में ऐसे शब्दों का उपयोग करते हैं कि रात ढल गई, दिन ढल गया और अँधेरा हो गया है । आमतौर पर सूरज ही उगता है, सुबह, दिन ही उगता है, दिन ही उदित होता है; जबकि शाम ढलती है ।
            ये भाषा के जो थोड़े-थोड़े अंतर हैं ये अपने आप में बड़े गहरे अर्थ लिये बैठे हैं, जो हमें समझना बहुत ज़रूरी है । “उदित “- इस शब्द से कुछ ऊर्जा की प्रतीति होती है । ऐसा लगता है कि हम कोई यात्रा शुरू कर रहे हैं, कहीं पहुँचना चाहते हैं । उदित शब्द में आरम्भ का भान होता है, जबकि अस्त शब्द में ढलने का, अंत होने का भान होता है, जैसे कोई यात्रा पूरी हो गई हो । इसके अलावा एक और गहरी बात समझने जैसी है कि “ढलना” शब्द में एक थकन है । यात्रा तो पूरी हो गई, पर एकदम थक गए, अब विश्राम चाहिए । इसीलिए हम थकन को रात से जोड़कर देखने लगते हैं । और अँधेरे का मतलब हमारे लिए है नाकुछ करना, अँधेरे का मतलब हमारे लिए है निष्क्रिय हो जाना । जबकि दिन का मतलब है सक्रिय होना । दिन है शुभ, रात है अशुभ । इन्हीं सब व्याख्याओं के चलते हमारे अंदर एक खंडन पैदा होने लगता है । हम खंडित जीवन जीने लगते हैं क्योंकि फिर हम जीवन को तोड़कर देखने लगते हैं दो ध्रुवों में जो आपस में एक दूसरे के विपरीत हैं । न केवल विपरीत हैं बल्कि विरोधी हैं । यह छोटी सी समझ कि जीवन टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता हमारे अंदर बड़ा गहरा परिवर्तन ला सकती है ।
            हमारी आँखें केवल एक प्रकार का प्रकाश देखने के लिए प्रशिक्षित की गई हैं – हम प्रकाश का ही प्रकाश देख पाते हैं, हम अँधेरे का प्रकाश नहीं देख पाते । हम प्रकाश की ही चमक जानते हैं, हम अँधेरे का आलोक नहीं देख पाते । और जानेंगे भी कैसे ? जिसकी हम निंदा ही करते बैठेंगे, जिससे हम दूर ही होते रहेंगे, जिसका मतलब हमारे लिए थकन हो, उसके पास हम जाएंगे भी क्यों ? इस प्रकार हम रात से दूरी बना लेते हैं और फिर जीवन को आधा-अधूरा जीने लगते हैं क्योंकि फिर हम दिन ही चाहते हैं । हम एक प्रकार का प्रकाश ही चाहते हैं ।
            हम अपेक्षा करते हैं कि जीवन में सब कुछ शुभ होना चाहिए । और वो शुभ की परिभाषाएँ भी हमने ही दी हुई हैं । जैसे मैं इस बात को दोहराता हूँ कि हम दिन ही उदित होते देखते हैं हमने कभी रात उदित होते देखी ही नहीं । किन्तु जो हमने नहीं देखा उसका अर्थ यह नहीं कि वो है ही नहीं । मात्र हमने देखा नहीं है । उदित तो रात भी होती है । अस्तित्व में तो सब कुछ उदित ही होता है । यहाँ कुछ अस्त होता ही नहीं कभी । तो वो सत्य जो हमने जाना ही नहीं है उसके बारे में भी हमने एक अवधारणा बना के रख ली है: रात अस्त होती है । सूरज का ही प्रकाश होता है । और इन सारी ग़लतफहमियों का ही परिणाम है कि हमारा जीवन अधूरा रह जाता है ।
            जैसे जो व्यक्ति मिलन में ही सुखी होते हैं, विरह में दुखी होते हैं वो यह बात नहीं समझ पाते कि मिलन का आनंद विरह से ही पैदा होता है । ऐसे ही जैसे संगीत का आनंद मौन में ही जाना जा सकता है । मैं वर्षों से शास्त्रीय संगीत का अभ्यास कर रहा था । और मुझे ऐसा लगने लगा था कि मुझे संगीत की समझ आ गई है । लेकिन असली समझ तब पैदा हुई जब मेरे अंदर मौन गहराने लगा । जब मौन उतरा तो यह बात मुझे समझ आने लगी कि कितना संगीत हर एक कण में, हर एक कोने-कोने में भरा हुआ है । लेकिन हम सुन ही नहीं पाते वो संगीत । पक्षियों की आवाजें इतनी मधुर ! यहाँ तक की पानी के बहने की आवाज़ जो कि हम सभी अपनी कल्पना में ही सुनते हैं । किसी कविता में पढ़ लिया, तो हमें लगा जान लिया जल-संगीत । आप रेत के ऊपर चल रहे हैं , कभी महसूस करके देखिए उसकी कितनी सुंदर आवाज़ होती है । यह संगीत तभी संभव है जब आपके अंदर मौन हो क्योंकि संगीत समाएगा कहाँ ? यदि आप पहले ही शोर से भरे हुए हों, तो संगीत के लिए स्थान ही कहाँ है अंदर ? वो स्थान तो मौन ही पैदा कर सकता है । तो मौन और संगीत एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं । पूरक हैं एक दूसरे के, यह एक दूसरे को पैदा करते हैं । कभी बहुत गहराई में संगीत यदि आप सुने तो आप अचानक मौन में चले जाएँगे । और इस चीज़ को आप एक कसौटी बनाकर भी रख सकते हैं कि यदि आप संगीत सुनते सुनते मौन में नहीं उतर गए तो फिर आप संगीत सुने ही नहीं हैं । तो मौन और संगीत एक दूसरे के लिए आवश्यक हैं । बिना मौन के संगीत पैदा हो ही नहीं सकता । और न बिना संगीत के कभी मौन पैदा होता है ।
            यही समझ हमें दिन और रात के बारे में भी जाननी होगी । दिन भी उदित होता है, रात भी उदित होती है; मौन भी संगीत है, संगीत भी मौन है । इसमें विरोधाभास नहीं है । कोई पेराडॉक्स नहीं है । या मानकर चलें कि पूरा अस्तित्व ही विरोधाभासी है । यहाँ जो हमें चीजें अंतर्विरोधी लगती हैं वो केवल और केवल इसलिए लगती हैं क्योंकि हम एकांगी जीवन जीते हैं, वनसाइडेड । इसी कारण एक असंतुलन पैदा होता है । जैसे जिसने रात की घटा को देखा हो, जिसने रात की सुंदरता को जाना हो वो सुबह की सुंदरता भी जान सकता है । लेकिन जो रात से भागता ही रहा है उसे दिन समझ में आएगा भी कैसे ? यह तो असंभव सी बात है । जिसने कभी अँधेरा ही ना देखा हो वो प्रकाश को जान भी कैसे सकता है ? जितने स्वीकार भाव से हम अँधेरे को देखेंगे, स्वीकार भाव से जितनी गहराई में हम अँधेरे को जानेंगे, उतनी गहराई में हम प्रकाश को भी जानेंगे । इसीलिए जीवन को पूर्णता में समझना बहुत ज़रूरी है ।
            हमारी आकांक्षा तो यही रहती है कि हमें जीवन में केवल और केवल सुख मिले । और जब कभी हम दुख को स्वीकार करते भी हैं तो उसमें कोई स्वीकार भाव होता नहीं है । अंदर ही अंदर तो शिकायत ही होती है । जब तक यह अंदर की शिकायत न चली जाए और जब तक स्वीकार अंदर से न आए तब तक वो स्वीकार स्वीकार है ही नहीं । जीवन को पूर्णता में जानने के लिए बहुत ज़रूरी है कि हम दोनों ध्रुवों को स्वीकार करें ।
            इसका अर्थ यह नहीं है कि आप दुखों को पैदा करें अपने जीवन में । क्योंकि यदि दुखों को पैदा करने की आड़ में आपका मन अभी भी सुखों की तलाश में ही है । मन का हिसाब-किताब तो यही है ना कि जितने ज़्यादा दुख होंगे, उतने ज़्यादा सुख होंगे । इस हिसाब-किताब से बचें । दुखों को पैदा ना करें । बस जब वो आएँ तो उन्हें स्वीकार करें । दुख की अपनी एक गहराई है । आपने गौर किया होगा सुख में आप इतने गहरे नहीं जाते जितने दुख में जाते हैं । मृत्यु आपके केंद्र को झंझकोरती है जीवन नहीं झंझकोरता । और फिर इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मृत्यु या पीड़ा के बारे में ही सोचते रहना है । बात मात्र इतनी सी है कि जो भी स्वाभाविक, सहज रुप से आपके अंदर आता है, आपके जीवन में जो आता है उसको स्वीकार करना है । अभी मैं एक क्लास में पढ़ा रहा था तो एक छात्रा ने मुझसे कहा कि “मैंने बहुत दिनों तक प्रयास किया कि मैं स्वीकार करूँ और मैं करती ही गई, करती ही गई, करती ही गई, लेकिन स्वीकार से कुछ भी बदला नहीं । स्थितियाँ जैसी थीं वैसी ही रहीं ।“ अब यही तो मन की चालाकियाँ है जो हम देख नहीं पाते । मैंने उसे कहा कि “जब तुमने स्वीकार कर ही लिया था तो तुम किस बात की प्रतीक्षा कर रही थीं ? किस बात का इंतज़ार कर रहीं थीं ? क्या बदलना चाहती थीं ? और यदि बदलाहट की आकांक्षा अंदर थी ही तो फिर स्वीकार था ही कहाँ ?” इस बात पर थोड़ा ध्यान दें कि हम जिसको स्वीकार कहते हैं वो अंदर ही अंदर तो अस्वीकार ही होता है । और जैसा कि ओशो कहते हैं कि हम क्योंकि उस परिस्थिति को बदल नहीं सकते तो हम अभिनय, एक दिखावा करने लगते हैं, छलावा कि हमने उसे स्वीकार कर लिया है । लेकिन अंदर झाँक कर देखें क्या वहाँ स्वीकार है भी ? स्वीकार के नाम पर अंदर-अंदर तो बस यही लगातार, लगातार भाव चल ही रहा है कि अब तो बदलेगा; अब तो मैंने स्वीकार कर लिया, अब तो बदलेगा । इन चीज़ो के प्रति होश में आने की ज़रूरत है नहीं तो आपकी ऊर्जा व्यर्थ ही जा रही है ।
            मन हमारे साथ किस-किस प्रकार के खेल खेल सकता है यह तो हमें भी पता भी नहीं है । हमारी कल्पना से भी बाहर की चीज़ है । हाँ, जितना हम होश में जीते जाएँगे धीरे-धीरे हम इन सारे खेलों को, मन की सारी चतुराई को समझना शुरू कर देंगे ।
            तो एक छोटी सी घटना कि रात भी उदित होती है जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ सिखा गई मुझे । और एक बात और कहना चाहूँगा अंत में कि जीवन हर समय, अस्तित्व हर क्षण हमारे साथ communicate कर रहा है । अपने संदेश पहुँचा रहा है । लेकिन वो संदेश हमें हमारी भाषा में नहीं पहुँचाए जा सकते । इसलिए नहीं कि अस्तित्व को हमारी भाषा नहीं आती, इसीलिए कि क्या हमें हमारी भाषा में जो कुछ बताया जाता है हम समझ ही लेते हैं ? अक्सर नहीं । और संकेत इसलिए दिए जाते हैं कि जो जागा हुआ है वो देख लेगा । क्योंकि जो सोया हुआ है उसे तो कुछ भी बता दिया जाए वो तो सब कुछ खो ही देगा । विस्मृत कर ही देगा । यदि आप अस्तित्व के साथ जुड़ना चाहते हैं तो आपको इन संकेतों को समझना होगा और इन पर प्रयोग करने होंगे । जो प्रयोग करेगा वही जानेगा और जो एक बार जान लेगा उसे फिर और कुछ जानना शेष नहीं रहता । यह रहस्य जान लें कि अस्तित्व के साथ वार्तालाप कैसे करनी है । शब्दों के पार, ध्वनि के पार जा कर कैसे एकलय, एकबद्ध अस्तित्व के साथ हो पाना है । फिर जैसा कि ओशो कहते हैं फिर तो पूरा जगत ही एक पाठशाला है । जीसस कहते हैं जिसके पास दृष्टि हो वो देख ले ।जिसके पास कान हों वो सुन ले । वे यही संकेत देना चाहते हैं कि जिसके पास हों कान वो सुन ले यह ध्वनि-रहित,शब्द-रहित संदेश अस्तित्व के।जिसके पास आँखे हों वो देख ले कि रात भी उदित होती है ।

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