क्या आप बचपन फिर से जीना चाहते हैं?

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एक बार मैंने कुछ विद्यार्थियों से पूछा कि, “आपके जीवन का सबसे सुंदर समय कौन सा था ? आपके अनुसार, मनुष्य जीवन का सबसे मधुर समय कौन सा होता है ? कौन सा जीवन आप हमेशा जीना चाहेंगे : बाल्यावस्था, युवावस्था, या वृद्धावस्था ?” उनमें से ज़्यादातर बच्चों का उत्तर था : बाल्यावस्था । यदि हम सभी से यह प्रश्न पूछा जाए तो हममें से ज़्यादातर का उत्तर भी यही होगा । ऐसा क्या है बचपन में जो हमें इसकी ओर खींचता है ? बचपन इतना मधुर क्यों लगता है ? हम क्यों बार-बार बाल्यावस्था में डूबना चाहते हैं ? उन बच्चों में से कुछ ने कहा कि, “बचपन सुंदर होता है क्योंकि बचपन में चिंताएँ नहीं होतीं । करियर क्या होना है, क्या बनना है, ये सारी चिंताओं से हम दूर रहते हैं । हमें इस बारे में परेशान नहीं होना पड़ता कि हम कितने प्रसिद्ध होंगे, कितनी शौहरत होगी हमारे पास, कितनी दौलत होगी, कितने लोग हमें जानेंगे, कितने हमारा सम्मान करेंगे, हमारा समाज में नाम होगा या नहीं होगा । इन सारी झंझटों से हम मुक्त होते हैं । इसीलिए बोझ नहीं होता और हम बड़े हल्के-हल्के महसूस करते हैं ।”
            यदि हम अपने बचपन में थोड़ा वापस लौटकर देखें तो हम भी यही पायेंगे कि बचपन सुंदर था क्योंकि हम स्वतंत्र थे, क्योंकि मन शांत था, क्योंकि विचारों का, सपनों का तूफ़ान नहीं चल रहा होता था । लेकिन इन सारे अवलोकनों की जड़ में जो उत्तर है वो यह है कि जब हम बच्चे होते हैं तब हम वर्तमान में होते हैं । हर एक बच्चा वर्तमान में जीता है । उसे अतीत की चिंताएँ और भविष्य के सपने नहीं घेरते । वह जो अब है ही नहीं और वह जो अभी है ही नहीं इन दोनों से वह मुक्त होता है । क्या कर लिया है और क्या करूँगा ? यह नहीं सोचता बच्चा । जो चला गया है उसका शोक नहीं है और जो आने वाला है उसकी उत्तेजना नहीं है । यह वर्तमान ही हमारे सारे सुखों का स्रोत है । और एक बच्चा स्वतः ही वर्तमान में जीता है ।
            दरअसल, अतीत और भविष्य एक बच्चे की चेतना के हिस्से नहीं होते । वह केवल और केवल अभी और यहीं जीता है । उसकी दौड़ न आगे है और न पीछे है । वह अभी और यहीं स्थित है । एक बच्चे में जो चहक और चमक होती है, जो जीवन की ललक होती है वह इस बात की है कि उसकी ऊर्जा न तो अतीत में व्यर्थ हो रही है और न भविष्य में व्यर्थ हो रही है । संग्रहित है उसकी ऊर्जा, अभी और यहीं, इस क्षण में । यह संग्रहित ऊर्जा उसके पूरे व्यक्तित्व को रोशन कर देती है । उसकी मुस्कान में, उसके चलने में, दौड़ने में, उठने में, बैठने में, बातों में एक रोशनी आ जाती है ।
            लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं हम वर्तमान से हटते जाते हैं । यदि आज आप थोड़ा देर के लिए यह चिंतन करें कि सुबह से लेकर अभी तक आपने कितना समय वर्तमान में जिया है तो आपको आश्चर्य होगा कि आप लगभग कभी भी वर्तमान में थे ही नहीं । पूरे वक़्त सपनों में, पूरे वक़्त यादों में डूबे रहने से ऊर्जा का ह्रास होता है । इसीलिए जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं हमारे चेहरे से वह चमक मिटती जाती है । जीसस ने कहा है कि, “जब तक आप बच्चों जैसे नहीं हो जाते तब तक आप परमात्मा के राज्य में कभी प्रवेश नहीं कर सकते । स्वर्ग का राज्य केवल उन लोगों के लिए है जो बच्चों जैसे हैं ।” बच्चे बन जाने का अर्थ सीधा सा है कि अभी और यहीं जीना सीख लेना । यही है स्वर्ग के राज्य में प्रवेश होने की कला । और जब जीसस स्वर्ग की बात करते हैं तो वे किसी धार्मिक स्वर्ग, जो कि किताबों में, ग्रंथों में वर्णित है, उसकी बात नहीं कर रहे क्योंकि उसी बाइबल में जीसस कहते हैं कि स्वर्ग का राज्य तुम्हारे अंदर है । स्वर्ग का राज्य अंदर होने का अर्थ सीधा सा है कि जब हम अपने अंतर-आकाश को सपनों, विचारों, यादों इन सबकी भीड़ से रिक्त कर लेते हैं, उसी रिक्त आकाश में स्वर्ग का राज्य उदित होता है । या यूँ कहें कि उदित तो नहीं होता, वहीं होता है हर वक़्त मौजूद, लेकिन स्मृतियों, सपनों, चिंताओं की धुंध में छिप जाता है । जैसे ही हम वर्तमान में आते हैं यह धुंध छट जाती है और वह स्वर्ग दिखने लगता है । मौन का स्वर्ग, शांति का स्वर्ग, आनंद का स्वर्ग !
            जब आप संतुष्ट होते हैं पूर्णरूपेण, एक भी इच्छा नहीं होती, डिज़ायर्स सारी समाप्त हो जाती हैं, तब अचानक आप देखते हैं कि अंदर गहन शांति है, गहन मौन है । यह मौन ही वह चीज़ है जो बचपन में हम जीते रहे हैं । हममें से ज़्यादातर लोगों को यह नहीं पता कि वह शांति कहाँ से आई है । इसीलिए हम बार-बार बचपन को याद करते हैं । हमें ऐसा लगता है कि यदि मौक़ा मिल जाए तो हम फिर बचपन में लौटना चाहेंगे ।
            इसके अलावा, हम जितना मृत्यु के पास पहुँचते जाते हैं उतना बचपन के प्रति खिंचाव बड़ता जाता है । लियो टॉल्सटॉय का एक उपन्यास है “द डेथ ऑफ इवान इलिच” । जब इवान मृत्युशय्या पर होता है, अकेला । उसके आसपास उसके प्रेमी, शुभचिंतक नहीं होते, तब वह बचपन की यादों में डूब जाता है । बार-बार उन दिनों को याद करता है जब वह छोटा था, स्कूल में पढ़ता था । कितना उन्मुक्त जीवन था उसका, चिंताओं से अलग, सहज, स्वतः बहता हुआ जीवन ! हम सभी भी कभी-न-कभी बचपन में वापस लौटना चाहते है ताकि उस मौन को फिर चख सकें । मृत्यु के क्षण यह लालसा और तीव्र इसीलिए होती है क्योंकि समय फिसलता हुआ लगता है ।
            उस मौन और शांति को चखने के लिए बचपन में लौटने की कोई ज़रूरत नहीं है । आप वह वर्तमान में जीने की कला अभी और यहीं सीख सकते हैं । जितने भी बुद्ध होते हैं, ऐनलाईटंड लोग होते हैं उनके चेहरे में वापस वो बालपन का आनंद दिखने लगता है । वो निर्दोष चमकती आँखें, ऐसा लगता है कि वे छोटे से मासूम बच्चे हैं । यह आनंद, यह मासूमियत वर्तमान में जीने से आती है । जब आप जीवन के साथ एकलय होते हैं, आप निडर होते हैं, निश्चिंत होते हैं, लोगों का मूल्यांकन बंद कर देते हैं, अंदर रिक्त होते हैं, तब आपमें एक सहज आनंद और चमक खिल जाती है ।
            इसीलिए याद रखिए : जो अपने बचपन को फिर से जीना चाहता है उसे वापस बच्चा बनने की आवश्यकता नहीं है । और होना चाहे भी तो भी नहीं हो सकता । अस्तित्व ने ऐसी व्यवस्था ही नहीं की कि हम बाल्यावस्था में लौट जाएँ । क्यों ? क्योंकि उसकी कोई ज़रूरत ही नहीं है । जो कुछ बचपन में हमें मिल रहा था वह अभी भी मिल सकता है । वह किसी भी उम्र में मिल सकता है–युवावस्था में, अधेड़ उम्र में, वृद्धावस्था में, किसी भी उम्र में वह मौन, वह शांति हम पा सकते हैं । और जो वर्तमान में रहने की कला जान ले फिर वह किसी भी उम्र में बच्चा ही बना रहता है । नासमझ नहीं, बचकाना नहीं, बच्चे जैसा । अतः, बालपन के आनंद की प्यास को तृप्त करने का केवल एक ही साधन है–अभी और यहीं जीना ।

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