अकेलापन क्या है? || अकेलेपन से मुक्ति

जब कभी कोई व्यक्ति ध्यान में प्रवेश करता है तो उसे एक अनुभव ज़रूर होता है : एक अजीब सी उदासी उसे घेर लेती है । यदि आपने भी कभी ध्यान किया है तो आपको भी यह अनुभव अवश्य हुआ होगा । और यदि कभी आप ध्यान करेंगे, तो यह उदासी आपको भी अवश्य घेरेगी । क्या है यह उदासी ? कहाँ से आती है यह ? इसे समझना बहुत ज़रूरी है क्योंकि यदि हम इसे न समझ पाए तो हम जीवन के गहनतम आनंद से वंचित हो जाएँगे । तो आइए जानने का प्रयास करें कि ये उदासी क्या है और इससे निदान का उपाय क्या है ।
            ध्यान एक प्रकार की शून्यता है । जो भी व्यक्ति ध्यान करना शुरू करता है वह धीरे-धीरे मौन होने लगता है, शून्य होने लगता है, उसके अंदर का आकाश रिक्त होने लगता है; एक नथिंगनेस(Nothingness) सी अन्दर प्रतीत होती है, जैसे कुछ भी नहीं है । पहली बार जब इस रिक्तता को हम देखते हैं, इसका सामना करते हैं, तो हम उदास हो जाते हैं । यह उदासी ध्यानी ही क्यों महसूस करते हैं, बाक़ी लोग क्यों नहीं करते ? इसलिए नहीं करते क्योंकि आमतौर पर लोग पूरे वक़्त व्यस्त हैं, तो मौन ही नहीं हो पाते । कुछ-न-कुछ चीज़ों से अपने आपको लगातार भरे रहते हैं–विचारों से, भावनाओं से, समस्याओं से, चिंताओं से, योजनाओं से; कुछ-न-कुछ लगातार मन के अंदर चलता ही रहता है । और चूँकि कभी अन्दर का आकाश रिक्त ही नहीं होता यह उदासी कभी समझ ही नहीं आती ।
            अब इसका अर्थ यह नहीं है कि ध्यान से उदासी पैदा होती है । ध्यान से उदासी पैदा नहीं होती, उदासी तो वहाँ होती ही है । अध्यानी के अंदर भी उतनी ही उदासी होती है जितनी ध्यानी के अंदर । ध्यानी को बस दिखना शुरु हो जाती है । ध्यानी उसके प्रति जाग जाता है, होश में आ जाता है । और क्योंकि अध्यानी हमेशा बेहोश ही रहता है इसलिए उदासी होते हुए भी उसे दिखती नहीं है । लेकिन फिर भी कभी-न-कभी ऐसा होता ही है कि हर कोई इस अजीब से ख़ालीपन को ज़रूर महसूस करता है । आप सभी ने भी कभी-न-कभी इसे ज़रूर जाना होगा । फिर आपने क्या किया ? आपने इससे बचने के उपाय ढूंढ लिए–किसी को फोन कर लिया या कभी व्हाट्सएप, किसी से गपशप कर ली या कोई किताब पढ़ ली, गाड़ी उठा कर कहीं घूमने चले गए या कोई पार्टी कर ली, पुराना कोई एल्बम निकाल लिया, कभी अतीत में चले गए, कभी भविष्य में चले गए; और आपने इस उदासी को दबा दिया । लेकिन एक ध्यानी होश में होता है इसीलिए उदासी को देख पाता है ।
दरअसल, यदि हम अपनी दिनचर्या को देखें, तो हम पाएँगे कि कुछ एक चीज़ों को छोड़ दिया जाए तो हम लगातार जो भी करते हैं हम अपने आप से बचने का उपाय कर रहे होते हैं, अपने आपसे भागने का उपाय कर रहे होते हैं । इतनी नीरसता है अंदर कि उससे बचने के लिए कोई मनोरंजन का साधन, कभी टीवी, कभी गाने सुनना, कभी क्रिकेट मैच देखना; जो कुछ भी हम करते हैं कहीं-न-कहीं उसकी जड़ में नीरसता होती है । इसीलिए हम लगातार वही, वही, वही चीज़ें करते रहते हैं । कभी किसी शादी में जाकर देखें । वहाँ वही सब कुछ तो होता है–एक दूल्हा होता है, एक दुल्हन होती है; वही वरमाला पड़ती है; वही डांस होते हैं; वही बारातियों का रुठना, घरातियों का मनाना; वही जीजा-साली के लड़ाई-झगड़े–कुछ भी नया नहीं होता । सब कुछ वही पुराना, वही कहानी । केवल एक अंतर होता है कि किरदार नए होते हैं । पर हम कितने उत्साहित, उत्तेजित हो जाते हैं शादी का समाचार सुनकर ! किसी मित्र की शादी तय हो गई है, रिश्तेदार की शादी है ! तो हम इतने नीरस हो गए हैं कि हम लगातार वही-वही जीवन जीते रहते हैं और अपने आप से भागते रहते हैं ।
            आपने देखा होगा कि कुछ लोग रिटायरमेंट, सेवानिवृति के बाद भी काम करते रहते हैं । हमें लगता है कि कितने जीवंत हैं, इनके अंदर कितनी ऊर्जा है ! लेकिन आप यदि ग़ौर करके देखें तो इनमें से ज़्यादातर लोग वे हैं जो अपने आप से भाग रहे होते हैं । 30-40 सालों तक काम करते-करते उनकी आदत बन गई होती है काम करने की, तो अचानक जब कुछ करने के लिए नहीं होता तो परेशान होने लगते हैं । यह भी एक आदत ही है । हाँ, कुछ लोग होते हैं जिनके पास जीवन का एक विज़न होता है, एक दृष्टि होती, उन्होंने कुछ खोजा होता है । इस दृष्टि को लोगों तक पहुँचाने के लिए वे लगातार, अथक प्रयास करते रहते हैं, बुढ़ापे में भी । बुद्ध 80 साल की उम्र तक कार्य करते ही रहे । जो प्रकाश उन्होंने जाना था लोगों तक पहुँचाते ही रहे । सड़ी-गली कुरीतियों के ख़िलाफ़ विरोध करते ही रहे । यह अलग कार्य है । लेकिन दूसरे लोग वर्कोह्लिक हैं, काम का नशा है उन्हें । वे लोग ऐसे क्यों होते हैं ? क्योंकि वे अंदर से नीरस हो गए होते हैं ।
            पहली बार जब आप निष्क्रिय होना शुरू होते हैं ध्यान के द्वारा–ध्यान एक प्रकार की निष्क्रियता है, ध्यान आपको अकर्ता बनाता है; आलसी नहीं, अकर्ता, नॉन-डूअर–जैसे-जैसे आप शांत होते जाते हैं, निष्क्रिय होते जाते हैं, पहली बार आप अपने अंदर के अकेलेपन से मिलते हैं, उसका सामना करते हैं । और उदासी होना स्वाभाविक है, क्योंकि अभी तक जो कुछ भी आप करते रहे थे वह सब नीरसता के कारण करते रहे थे । नीरसता का अर्थ है एक प्रकार की मृत्यु । नीरसता का अर्थ है कि जीने के लिए, उत्सव मनाने के लिए, आनंद मनाने के लिए जीवन में कुछ भी नहीं है । इसी नीरसता में जीते-जीते आप मृत होते गए ।
            पहली बार जब आप शांत होते हैं आप नीरसता को देखते हैं । इससे भागते नहीं, इसे झुठलाते नहीं, इसे स्वीकार करते हैं । देखते हैं कि, “आज तक मैं स्वयं से भागता ही रहा । स्वयं से कभी मिल ही न पाया ।” यही अनुभूति उदासी का कारण बनती है । शुभ समाचार यह है कि यह उदासी पहला क़दम है उस परम आनंद को जानने का । उदासी इस बात का सूचक है कि पहली बार आप स्वयं से मिलने के लिए तैयार हैं । आपने भागना बंद कर दिया है । आप स्थिर हो गए हैं । आपमें ठहराव आ गया है ।
            इस उदासी से कभी भी भागना नहीं है; बस इसके साक्षी बनिए, देखिए इसे । जितना आप देखेंगे उतनी यह पीड़ा देती जाएगी, उतना अँधेरा आसपास छाता जाएगा । लेकिन देखते ही रहें इसे । इससे ज़्यादा डरावना अनुभव, इस अंदर के ख़ालीपन से ज़्यादा भयानक अनुभव इस पूरे जगत में कोई भी नहीं है । लेकिन इसके पार जो आनंद है उससे मधुर आनंद भी कोई नहीं है । चूँकि हममें से ज़्यादातर लोग इस उदासी से डर कर भाग जाते हैं इसीलिए इसके पार क्या है उससे भी चूक जाते हैं । तो ध्यान को और गहराना है । साक्षी बनिए, बस । साक्षी है मूलमंत्र । साक्षी है कुंजी । लगातार देखते रहें इस उदासी को । कृष्णमूर्ति कहते हैं कि चूँकि हम एम्प्टीनेस, ख़ालीपन से भागते रहते हैं इसलिए हम देख नहीं पाते कि ख़ालीपन जैसी कोई चीज है ही नहीं । धुंध है जो कि साक्षी की अग्नि से चलकर समाप्त हो जाती है । तो देखना है साक्षी बनकर लगातार । जितनी भी पीड़ा हो, ख़ालीपन जितना भी गहराए, जितना भी सघन हो, बस देखते रहें ।
            देखने का मतलब सीधा सा है इसके प्रति जागृत रहें, होश में रहें, अवेयर रहें । यह जाने कि ख़ालीपन है, पर इसके संबंध में कुछ भी न करें । यह आपको चारों तरफ से घेरती है, इसे घेरने दें । कुछ भी नहीं करना है । संपूर्ण निष्क्रियता में जीना है । क्योंकि जो कुछ भी आप करेंगे वह आपको अपने आपसे दूर ले जाएगा । और देखते वक़्त यह बिल्कुल न सोचें कि, “मैं देख रहा हूँ, अब मुझे इसके पार का कुछ मिलेगा ।” ये सारे विचार बाहर निकाल दें । जैसे ही आप सोचना शुरु करते हैं कि, “इस ख़ालीपन के पार का जो आनंद है वह मुझे मिलेगा” उसी क्षण आप साक्षी नहीं रह जाते हैं क्योंकि फिर मन आ जाता है । और जहाँ मन है वहाँ साक्षी नहीं हो सकता । तो किसी भी प्रकार का विचार, यहाँ तक कि यह विचार कि, “ख़ालीपन है और मैं इसे देख रहा हूँ” यह विचार भी नहीं होना चाहिए । बस आप देख रहे हैं तो बस देख रहे हैं । फिर यह सोचना भी क्या कि आप क्या देख रहे हैं ?
            जब आप लगातार इसके साक्षी बने रहेंगे तो पहली बार आप समय-स्थान के पार का कुछ जान पाएँगे । कोई आनंद, अपरिचित सा, अज्ञात सा, अंजाना सा, अपरिभाष्य आनंद आपको अचानक भर देगा ! कुछ फूटेगा अंदर, रस ! और आपके अंग-प्रत्यंग में, आपकी एक-एक कोशिका में रस भर देगा । जिस क्षण आप इस रस से भरेंगे आप यह जानेंगे कि ख़ालीपन जैसा कुछ था ही नहीं । ख़ालीपन एक छलावा था, मन का एक धोखा था । जिस क्षण आप इस छलावे को जान लेते हैं उसी क्षण आप भागना बंद कर देते हैं क्योंकि फिर भागना किससे ? जो है ही नहीं उससे डर कैसा ? जो है ही नहीं उससे भागना कैसा ? जिस क्षण यह समझ पैदा होती है, जिस क्षण यह अंतर्दृष्टि आती है कि ख़ालीपन जैसी कोई चीज़ है ही नहीं आप अपने आपमें लगातार डूबने लगते हैं, डूबते ही जाते हैं । उस दिन आप एक अद्भुत स्वतंत्रता को जानते हैं, क्योंकि आप किसी पर निर्भर नहीं होते हैं अपने सुख के लिए, अपने आनंद के लिए । अब आप स्वतंत्र हैं । जब मर्ज़ी हो अंदर डूब जाएँ उस आनंद में, उस रस में ! और चाहें तो हमेशा डूबे रहें !

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