स्वीकार: रूपान्तरण का महामंत्र

स्वीकार एक जादुई शब्द है । इसके अंदर मनुष्य को रूपान्तरित करने की अद्भुत क्षमता है । स्वीकार मात्र से ही व्यक्ति जीवन के साथ एकलयता प्राप्त कर सकता है । जिससे उसके सारे सम्बन्धों में, चाहे वो मानवीय हों, चाहे प्रकृति के साथ, एक नयी ऊर्जा आने लगती है, एक नयी समझ पैदा होने लगती है । और सबसे बढ़कर, स्वीकार एक ऐसी तृप्ति प्रदान करता है जिसमें डूबने की उत्कंठा हर एक मनुष्य में मौजूद है ।
            स्वीकार शब्द बड़ा साधारण सा प्रतीत होता है, लेकिन ये मनुष्य की भाषा में मौजूद चंद सुंदर शब्दों में से एक है । वो शब्द हैं – प्रेम, जीवन, मृत्यु, ईश्वर, आत्मखोज, मोक्ष, इत्यादि । यदि हम देखें तो कहीं न कहीं हमें ऐसी भ्रांति होती है कि हम सभी इन शब्दों से सुपरिचित हैं, इन्हें भली-भाँति जानते हैं । ये भ्रम पैदा कहाँ से होता है ? दरअसल, इन शब्दों का उपयोग हम इतना अधिक करते हैं, इनको बहुधा सुनते हैं दूसरों से कि हमें ऐसा लगने लगता है कि शायद हम इनके असली अर्थ जानते हैं । फिर इन्हें और गहरे में जानने की आवश्यकता ही क्या है ? जैसे आज ही मेरे पास एक छात्र आया । उसने एक लेख लिखा था प्रेम के ऊपर । शब्दों का चुनाव बहुत अच्छा था और विषयवस्तु का तर्कबद्ध रूप से प्रस्तुतीकरण था । उसको पढ़ने के बाद बच्चे ने मुझसे मेरी राय माँगी लेख के बारे में । मैंने कहा, “लेख तो बहुत अच्छा है, बस मृत है । इसमें सब कुछ है सिवाय आत्मा के । जैसे मृत शरीर को अच्छे से सजा दिया गया हो या फिर एक प्लास्टिक के फूल पर इत्र डाल दी गई हो ऊपर से, कृत्रिम सुगंध पैदा कर दी गई हो ।” लेख में लेखक के अनुभवों से कुछ भी नहीं आया था । लेखक के अनुभवों की सुगंध नहीं थी उसमें । दूसरों की, पुस्तकीय ज्ञान की इत्र उसने अपने लेख-रूपी फूल में डाल दी थी । ऐसे ही हम भी प्रेम, जीवन, मृत्यु, परमात्मा इन सारे शब्दों का उपयोग करते रहते हैं इनका बिना अनुभव किए । स्वीकार शब्द भी उनमें से एक है ।
            आइये हम स्वीकार को जानने का प्रयास करते हैं । सावधानीपूर्वक इसमें प्रवेश करते हैं । स्वीकार को सीधे-सीधे न जानकर हम एक काम कर सकते हैं कि इसका जो विपरीत ध्रुव है – अस्वीकार – वहाँ से शुरू करते हैं क्योंकि हम ज़्यादातर अस्वीकार में ही जीते हैं । अंग्रेजी के एक लेखक ने कहा है कि शिकायत परमात्मा को अर्पित किया जाने वाला सबसे बड़ा tribute है । यदि हम अपने जीवन में भी देखें तो सुबह से लेकर शाम तक हम कितनी शिकायतों से भरे रहते हैं ! हर एक चीज़ के प्रति शिकायत । ट्रेफिक जाम है तो शिकायत है, मौसम ठंडा है तो चिढ़चिड़ाहट, गर्म है तो चिढ़चिड़ाहट, कुछ खो गया और खुद ने ही खो दिया तो शिकायत, प्रेमी से शिकायत, प्रेमिका से शिकायत, बॉस से शिकायत, गाड़ी से शिकायत, पड़ोसी से शिकायत, हर वक़्त शिकायत । शिकायत स्वीकार का बिल्कुल विपरीत है । जो शिकायत में हर वक़्त जी रहा है वो स्वीकार के विरोध में खड़ा है ।
            कभी-कभी ऐसा हमें लगता है कि हमने जीवन को स्वीकार कर लिया है । लेकिन वो स्वीकार होता ही नहीं है । वो बस सतह पर स्वीकार होता है, अंदर-अंदर तो हम कुंठा में ही जी रहे होते हैं, हम शिकायत कर ही रहे होते हैं । जैसे कि, मान लें कि किसी व्यक्ति का पैर टूट गया । उसको प्लास्टर चढ़ा हुआ है । अब वो क्या करेगा? वो जानता है कि उसे बिस्तर में ही पड़े रहना पड़ेगा, वो उठ ही नहीं सकता । उसे लगता है कि उसने इस स्तिथि को स्वीकार कर लिया है । किन्तु क्या सच्चा स्वीकार है वहाँ ? वो व्यक्ति अपने अंदर झाँक के देखे, तो उसे पता चलेगा कि वो तो कब का बिस्तर छोड़ के दौड़ना चाहता है । लेकिन कुछ कर नहीं सकता । इस विवशता को हम स्वीकार का नाम दे देते हैं । स्वीकार विवशता नहीं है । वो तो अंदर से आता है, पूर्ण होता है, उसमें शिकायत का कोई पुट नहीं होता । स्पष्ट है कि, जो व्यक्ति स्वीकार इसीलिए कर रहा किसी चीज़ को क्योंकि वो उसमें फँस गया है, तो ये मात्र मजबूरी है । फिर ये स्वीकार लादा गया स्वीकार है । लेकिन ये लादना कभी कोई रूपान्तरण नहीं ला सकता क्योंकि अंदर-अंदर तो अस्वीकार चल ही रहा है । स्वीकार तो महज़ दिखावा है, छलावा । आत्मछल में जी रहें है हम । हमें लग रहा है कि हम स्वीकार कर लिए हैं । जबकि स्वीकार के अंदर अस्वीकार ही चल रहा है ।
            ये प्रवंचना केवल स्वीकार के संबंध में ही नहीं है । हमारे जीवन के सारे कृत्यों में इसकी झलक मिल जाएगी । हम जिसको प्रेम मानते हैं, थोड़ा अंदर झाँक कर देखें तो उसमें घृणा ही मिलेगी; जिसे हम जीवन कह रहे हैं वो मृत्यु ही है; जिसे जागरण कह रहे हैं वो बेहोशी ही है, जिसे हम आनंद कह रहे हैं वो संताप ही है, जिसे हम पाना कह रहे हैं वो खोना ही है, जिसे हम जीना कह रहें हैं वो मरना ही है । खलील जिबरान की एक कहानी है: एक बार सुंदरता और कुरूपता साथ स्नान करने एक नदी में गईं । नदी के किनारे उन्होंने अपने कपड़े उतार के रखे और नदी में उतर गईं । कुरूपता नहा कर पहले निकली । उसने देखा कि सुंदरता अभी भी नदी के अंदर ही है । उसे एक शरारत सूझी: उसने सुंदरता के कपड़े पहने और वहाँ से जल्दी से भाग गई । जब सुंदरता बाहर आई तो अपने कपड़े वहाँ ना पाकर बहुत परेशान हो गई । लेकिन कोई चारा ना देखकर, उसने कुरूपता के कपड़े मजबूरन पहने । तब से लेकर आज तक सुंदरता और कुरूपता एक-दूसरे के परिधान में ही घूम रहीं हैं । वैसे ही हमारे अस्वीकार ने भी स्वीकार ने परिधान पहन रखें हैं । लेकिन हम कभी इनके बारे में गम्भीरता से चिंतन करना ही नहीं चाहते । हम इन्हें अनदेखा करते रहतें हैं । इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि हमारा ख़ुद का जीवन भी बड़ा संतापग्रस्त हो जाता है ।
            यदि इतनी समझ भी कि जिसको हम स्वीकार कह रहे हैं दरअसल वो अस्वीकार ही है, मात्र इतनी समझ, पहला क़दम है रूपान्तरण की तरफ़ । ये देख पाना, इस छलावे को देख पाना, बस ये दृष्टि ही आपको मुक्त कर सकती है । क्योंकि जब हम देख लें कि हमने स्वीकार तो किया ही नहीं तो फिर हम स्वीकार को जानने के लिये उत्सुक ज़रूर होंगे । तो यदि अभी हम इतना मान लें कि हम लगातार शिकायत में जीते हैं, हम स्वीकार नहीं करते कोई भी चीज़, और जो कुछ स्वीकार करते भी हैं वो महज़ ऊपरी होता है, तो हमने स्वीकार को जानने कि दिशा में पहला क़दम उठा ही लिया ।
            अब चलिए हम आगे बढ़ते हैं । किसी भी परिस्थिति, व्यक्ति या स्थान को स्वीकार करने से पहले हमें अपने आप को स्वीकार करना पड़ेगा । स्वयं का स्वीकार । पर ये क्या है ? स्वयं को स्वीकार करने का अर्थ क्या है ? स्वयं को स्वीकार करने का अर्थ है कि हम जैसे भी हैं अपने आप को वैसा स्वीकार कर लें । अब हम देखते हैं कि हम लगातार अपनी तुलना दूसरों से करते रहते हैं । जैसे कि हमारे मित्र के पास धन अधिक है, हम निर्धन हैं; कोई हमसे देखने में ज़्यादा अच्छा लगता है, ज़्यादा आकर्षक है, हम उतने आकर्षक नहीं हैं; कोई हमसे ज़्यादा अच्छे अंक ले आता है परीक्षा में; किसी के पास हमसे बहुत बड़ी गाड़ी है । हम लगातार तुलना करते ही रहते हैं । और जितनी बार हम अपनी तुलना दूसरों से करते हैं हम अपने आपको हीन बनाते हैं । Inferiority complex अपने अंदर पैदा करते हैं । इस तुलना के मनोविज्ञान को थोड़ा ध्यान से समझिए । तुलना करने का अर्थ है कि हम किसी और के जैसा बनना चाहते हैं । अब इसका अर्थ ये है कि अस्तित्व ने जो कुछ हमें प्रदान किया है हम उसका अनादर कर रहे हैं । तो याद रखिए जब भी आप स्वयं का अनादर करते हैं, वो अनादर बस स्वयं का नहीं होता, वो अनादर पूरी प्रकृति का होता है, पूरे अस्तित्व का होता है । आप अस्तित्व पर आक्षेप लगा रहे होते हैं कि मुझे तो यहाँ नहीं होना था, मुझे तो कहीं और होना था, तुमने यहाँ भेज दिया । मुझे तो कुछ अलग दिखना था, तुमने मुझे ये रूप दे दिया । ये शिकायत अस्तित्व का अनादर नहीं तो और क्या है ?
            अपने आप की तुलना दूसरों से करना, दूसरों के जैसे बनने की इच्छा रखना, ये आपको अपने आप से दूर ले जाता है । आप अपने आप की निंदा करने लगते हैं और जो स्वयं की ही निंदा करने लगेगा वो स्वयं को स्वीकार कर ही नहीं सकता । जो स्वयं की आलोचना करेगा उन बातों के लिए जो बिल्कुल बाहरी हैं, जो बिल्कुल महत्वहीन हैं, वो स्वयं को स्वीकार नहीं कर सकता । तो स्वयं के प्रति स्वीकार-भाव जगाने की दिशा में पहला क़दम यह है कि हम स्वयं की तुलना दूसरों से करना बंद करें । हमें बचपन से कई अजीब सी चीज़े सिखाई गई हैं । जैसे हमें प्रतिस्पर्धा करना, कॉम्पटिशन करना, सिखाया गया है । कुछ लोग कहते हैं कि प्रतिस्पर्धा तो हानिकारक है लेकिन healthy competition, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हमारे विकास के लिए ज़रूरी है । दरअसल, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं है । प्रतिस्पर्धा का अर्थ ही है किसी को हराना, किसी से आगे बढ़ने की कोशिश करना । जब आप लगातार किसी से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं तो आप एक तनाव में जीयेंगे । आप विश्राम में नहीं जी सकते क्योंकि लगातार आपको भागना होगा । आप रुकेंगे कैसे? जैसे ही रुके पीछे वाला दौड़ कर आपसे आगे निकल जाएगा । तो एक जद्दोजहद, एक लड़ाई पूरे वक़्त आपके अंदर चलती रहेगी । आप भागते रहेंगे । और जो लगातार भाग ही रहा हो वो कभी स्वस्थ नहीं हो सकता । किसी से बेहतर बनने की लालसा, किसी से आगे निकलना का सपना, ये सब बीमारियाँ हैं । जब आप अपने आप को इन बीमारियों का शिकार बना रहें हैं और जब आप बीमार ही हो गए, तो फिर आप अपने आपको स्वीकार नहीं कर सकेंगे । प्रतिस्पर्धा अपने आप में ही रूग्णता है । इसका निदान है तुलना को छोड़ देना ।
            फिर मैं दोहराता हूँ कि स्वीकार का अर्थ है तुलना दूसरों से बंद करना । एक शिक्षक होने के नाते, मैंने लगातार ये देखा है कि जब भी कभी मैं बच्चों को उनकी उत्तर पुस्तिकाएं दिखाता हूँ तो उनका सबसे पहला प्रश्न होता है कि “सबसे ज़्यादा किसके अंक आए?” मैं उन्हें कहता हूँ कि, “ ये जानना क्यों ज़रूरी है? यदि आपके अंक आपकी क्षमता के हिसाब से ठीक आए हैं, तो आपको इस बात की संतुष्टि होनी चाहिए ।“ आश्चर्य ये होता है कि उन्हें इस बात से ज़्यादा मतलब नहीं होता है कि जिसके अच्छे अंक आए हैं उसके पढ़ने का ढंग क्या है, उत्तर लिखने का ढंग क्या है । हाँ, यदि कोई सर्वाधिक अंक पाने वाले छात्र से कुछ सीखें कि उत्तर कैसे लिखने हैं, तैयारी कैसे करनी है, ये तो सीखना हुआ और सीखना हमेशा ही स्वस्थ होता है । लेकिन किसके सबसे ज़्यादा अंक आए हैं और उससे मेरे कितने कम हैं, ये प्रतिस्पर्धा है । और प्रतिस्पर्धा हमेशा ही रुग्ण होती है । इन सारी बातों को आपको स्पष्टता से समझना होगा । यदि कोई व्यक्ति आपसे बेहतर गाना गा सकता है, तो वो कैसे गा रहा है, ये सीखना एक बात है और उससे ईर्ष्या करना बिल्कुल अलग बात है । तो यदि सीखने के लिए तुलना है तब तो ठीक है । लेकिन फिर वो तुलना रही भी कहाँ ? फिर तो कोई तुलना ही नहीं रही । फिर तो कोई आपको देने वाला है और आप ग्रहण करने वाले हो । तो स्वीकार में तुलना नहीं होगी और जब तक तुलना होगी तब तक स्वीकार नहीं होगा ।
            दूसरी बात, प्रशंसा सुनने की ललक हमारे अंदर अति में है । ज़्यादातर लोगों के कान तरस रहे होते हैं प्रशंसा के दो शब्द सुनने के लिए । वे कुछ भी करें, कुछ भी, बस वे ढूँढ रहे होते हैं कि कोई मिल जाए, दो शब्द बोल दे प्रशंसा के । उनके प्राण सूखी धरती जैसे होते हैं जो प्रशंसा की दो बूँद पड़ते ही लहलहा उठती है । अब प्रशंसा का मनोविज्ञान समझें: जब आप चाहते हैं कि लोग आपकी प्रशंसा करें तो हो क्या रहा है? यदि वो प्रशंसा ना करें तो आप ख़ाली महसूस करते हैं, आप दुखी होते हैं । इसका क्या मतलब है ? इसका अर्थ ये है कि दूसरा इस बात का निर्णय लेगा कि आप दुखी होते हैं, कि सुखी होते हैं । आप उसके दास बन गए, slave । इस तरह से आप दूसरे के हाथ में कठपुतली बन जाते हैं । जैसे वो नचाएगा आप नाचेंगे । याद रखिए ग़ुलाम कभी ख़ुश नहीं होते । तो दूसरों से प्रशंसा पाने का भाव एक बहुत ही बड़ी बीमारी है जो बड़ी व्यापक है । इसके जीवाणु हर जगह मौजूद हैं । इनसे बचने का प्रयास कीजिए ।
            अपने आप को स्वीकार करने का अर्थ छोटा सा है: आप जो हैं बस उसे जानिए । एक बड़ी अच्छी बात होती है जैसे ही आप अपने आपको स्वीकार करते हैं: आप अपनी कमियों के प्रति भी जाग जाते हैं, सचेत हो जाते हैं । आमतौर हमें पता ही नहीं होता कि हमारी कमियां हैं क्या, क्योंकि हम हर वक़्त भाग रहे होते हैं दूसरों से दौड़ में आगे निकलने के लिए । जब आप शांत होकर अपने साथ कुछ समय बिताते हैं तब आपको समझ आने लगता है कि आपको क्या-क्या करना है । कहाँ-कहाँ आपको अपना विकास करना है । जैसे मान लो आपको क्रोध बहुत जल्दी आता है । अब अपने आप को स्वीकार करने का अर्थ है कि आप अपनी तुलना दूसरों से न करें कि अगला व्यक्ति बड़ा शान्तचित्त है और मैं बड़े क्रोधी स्वभाव का हूँ । मैं अपना आपा बड़ी जल्दी खो देता हूँ, तो मैं बुरा हूँ और वो अच्छा है, ये है तुलना । तो अपने आप को स्वीकार करिए कि जो अगला व्यक्ति है उसका स्वभाव है शांत होना । आप क्रोधित हो जाते हैं तो अपने आप को स्वीकार करिए । जैसे ही आप स्वीकार करेंगे, आपको एक समझ आएगी कि क्रोध करके मिलता क्या है? सिवाय अपने आप को जलाने के, कुछ भी तो नहीं मिलता । अब आप सड़क पर चल रहे हैं और कोई व्यक्ति दौड़ते-दौड़ते आ रहा है । वो आपको नहीं देखता और आपसे टकरा जाता है । आप तुरंत क्रोधित हो जाते हैं । वो आपसे क्षमा मांगता है और आगे बढ़ जाता है । वो तो चला गया लेकिन आप अपने क्रोध की अग्नि में जलते रहते हैं । आप अपने तन-मन को जलाते हैं । अपने आपको प्रताड़ित करते हैं । उससे कुछ भी तो नहीं मिलता है । ये समझ आपको शांत कर देती है । याद रखिए, क्रोध का दमन नहीं करना है । क्रोध आ रहा है तो आने दीजिए । उसे दबाएंगे, उसे रोकेंगे तो एक दिन वो और बल के साथ बाहर निकलेगा और विस्फोटक हो जाएगा । तो दबाना बिलकुल नहीं है, बस देखना है कि क्रोध है और ये समझना है कि उससे कभी कुछ मिला ही नहीं । फिर क्यों व्यर्थ ऊर्जा नष्ट करनी? ये समझ ही आपको क्रोध से मुक्त करने में बड़ी सहायक हो सकती है, बाक़ी काम तो ध्यान कर ही देता है ।
            कुछ लोग ईर्ष्यालु होते हैं । यदि आप भी ईर्ष्यालु प्रवत्ति के हैं और थोड़े से भी जागे हैं तो देखेंगे कि जब आप ईर्ष्यालु होते हैं, दूसरों की बुराई करते हैं तो आप देखते हैं कि कुछ लोग नहीं कर रहे बुराई । तुरंत आप अपनी तुलना उन लोगों से करने लगते हैं कि वो लोग बेहतर हैं वो बुराई नहीं करते और मैं हर समय ईर्ष्या में ही लिप्त हूँ । फिर तुलना शुरू हुई, फिर आपने अपने आप को अस्वीकार किया, फिर आपने अपनी निंदा की और जो स्वयं की निंदा करेगा वो अपने आप को स्वीकार नहीं कर पाएगा । लेकिन अपने ईर्ष्यालु स्वभाव को स्वीकार करने का अर्थ ये नहीं है कि आप हमेशा दूसरों से जलन करते रहें । नहीं, बस ये देखें कि आप ईर्ष्या कर रहे हैं । बस देखना है जाग के । और जैसे ही आप देखेंगे एक छोटी सी बात समझ में आ जाएगी कि पूरी ईर्ष्या नासमझी से ज़्यादा कुछ भी नहीं है । क्या मिलता है उस ईर्ष्या से? क्या मिलता है बुराई करने से? कुछ भी तो नहीं मिलता । ख़ाली आप जैसे हैं वैसे ही रहते हैं । हाँ, समय बर्बाद कर लिया, अपने आप को दुर्गंध से भर लिया, कचड़े से भर लिया और कुछ भी नहीं । थोड़ी सी खुजलाहट थी उसे एक क्षण के लिए शांत कर लिया । ये नासमझी देखनी है बस । ईर्ष्या को पाल के नहीं रखना है । जो स्वीकार करेगा उस स्वीकार में ही उसे दृष्टि मिलेगी । वो देख लेगा कि ईर्ष्या से कुछ भी नहीं मिलता और जिसने देख लिया वो मुक्त हो गया ।
            तो अपना सम्मान करिए । सेल्फ-रेस्पेक्ट, आत्मसम्मान का मतलब यही होता है । आत्मसम्मान का मतलब घमंड करना या गर्व करना नहीं है । आत्मसम्मान का मतलब दूसरों के अंदर अपने लिए सम्मान पैदा करना नहीं है । आत्मसम्मान का मतलब स्वयं के अंदर स्वयं के लिए सम्मान पैदा करना है । अपने आप को हीन न मानना, ये है आत्म-सम्मान ।
            अंत में मैं यही कहूँगा कि स्वीकार करें । और स्वीकार स्वयं से शुरू करें । तुलना करना बंद करें अपनी दूसरों से । दूसरों से तारीफ़ सुनने की जो ये प्यास है इसे ख़त्म करें । जिस दिन हम अपने आपको स्वीकार करना सीख जाते हैं उसी दिन रूपान्तरण होता है । फिर हम दूसरों को भी स्वीकार करना सीख जाते हैं । फिर हम दूसरों को बदलने का प्रयास नहीं करते, बल्कि हमारे स्वीकार में दूसरों को स्थान मिलता है, समय मिलता है अपने आपको स्वीकार कर पाने का । और जो स्वीकार करना सीख जाता है अपने आपको, वो जीना भी सीख जाता है । जिस दिन शिकायत ख़त्म हो जाती है उस दिन शांति उतर आती है । उस दिन आप जीवन के साथ लयबद्ध होना सीख जाते हैं । जिस दिन आपके अंतस में स्वीकार का फूल खिलता है उस दिन समस्त जगत ही एक बागीचा बन जाता है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *