अंधविश्वास का निदान

एक बार मेरे पास एक छात्र का फोन आया । बड़ा हताश था । किसी तीर्थ यात्रा पर गया था ज्ञानार्जन के लिए, लेकिन वहाँ उसे कुछ और ही मिला । वहाँ उसने देखा कि किस प्रकार पंडित और पुरोहित अपना जाल बिछाए बैठे हैं अज्ञानियों को पकड़ने के लिए । किस प्रकार वे भगवान को बेच रहे थे वहाँ । 2000 रुपये का यज्ञ करवाकर कोई बैकुंठ बेच रहा था, कोई 5,000 का यज्ञ करवाकर उसके ऊपर का दैवीय स्थान बेच रहा था । इन सारी चीज़ों ने उसे बड़ा बेचैन कर दिया और उसने मुझे फोन किया । थोड़ा संवेदनशील बच्चा है, विचारशील भी है, तार्किक भी है । उसका प्रश्न यही था कि इस अंधकार से निकलें कैसे ? इस अंधविश्वास से लोगों को दूर कैसे करें ?
हममें से ज़्यादातर लोग ऐसे ही किसी दृश्य को देखते हैं तो बेचैन हो उठते हैं । दूसरों को लुटते देख कर, दूसरों का शोषण होते हुए देख कर व्यथित होते हैं । लेकिन हम अपने से प्रश्न पूछना भूल जाते हैं कि, “मुझे कैसे मालूम है कि वह अमुक व्यक्ति अंधकार में हैं ?” हम किस प्रकार इस बारे में आश्वस्त हैं कि हम सत्य जानते हैं ? हम कैसे सत्य और अंधविश्वास के बीच के भेद को जानते हैं ? हमारे पास कसौटी क्या है ? इसी आत्म-अवलोकन से हमें इस प्रश्न का उत्तर मिलता है कि हम लोगों के लिए कर क्या सकते हैं । बुद्ध ने कहा है: “अप्प दीपो भवः” अपने दीये स्वयं बनो । कितनी सुंदर बात है ! बुद्ध हमें हमारे प्रति हमारा उत्तरदायित्व दिखाना चाहते हैं, वह हमें अपने स्वयं के लिए ज़िम्मेदार बनाना सिखा रहे हैं; क्योंकि जिसका स्वयं का दिया ना जला हो, जिसके अंदर स्वयं ही प्रकाश ना हो, वह दूसरों के अंधकार को दूर करेगा भी कैसे ! जो खुद ही भटका हो, जिसे खुद के मार्ग का ही पता ना हो, वह दूसरों को मार्गदर्शन कैसे देगा । कहीं ना कहीं हम अपने आसपास देखते हैं कि हर भटका हुआ व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को रास्ता दिखा रहा है । शायद यही देख कर जीसस ने कहा था बाइबिल में कि “If a blind leads another blind both shall fall into a ditch.” यदि एक अंधा दूसरे अंधे को रास्ता दिखाए तो दोनों ही गड्ढे में गिरेंगे । तो जीसस ने भी यही कहा कि पहले स्वयं का प्रकाश तो जान लो ।
हम ये कैसे जानें कि जो दूसरों को रास्ता दिखा रहा है उसने स्वयं का प्रकाश पा लिया है या नहीं ? याद रखिए जो स्वयं के प्रकाश को जानता है वह अँधेरे को देख कर व्यथित नहीं होता । यदि आपने अपने अंदर के प्रकाश को जान लिया है फिर अँधेरा आपको परेशान नहीं कर सकता । तो ये एक कसौटी है जानने कि कौन अँधेरे में है कौन नहीं । यह कोई तार्किक निष्पत्ति नहीं होती है, यह शुद्ध दर्शन होता है । आप देख रहे होते हैं और जान रहे होते हैं ।
लेकिन अंधविश्वास का निदान हम दर्शन से ना करके तर्क से करने लगते हैं । तर्क और अंधविश्वास की लड़ाई बड़ी पुरानी है । तार्किक और तथाकथित अंधविश्वासी एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं । जब कभी आप किसी तार्किक व्यक्ति से मिलें तो आप पाएँगे कि वह पहले से ही अपने आप को बड़ा उच्च मान कर चलता है और अंधविश्वासियों को एक हेय दृष्टि से देखता है । लेकिन कभी आपने गौर किया है कि जो तर्क है वह भी एक प्रकार का अंधविश्वास ही है । अंधविश्वास होता क्या है? अंधविश्वास का मतलब है कि किसी चीज़ पर विश्वास कर लेना बिना इसका पता लगाए कि वो है भी या नहीं । बस उस पर विश्वास कर लेना अंधे होकर । बिना देखे बस उसे मान लेना । जैसे आप आँख बंद किए हों और आपसे कोई कह दे कि आपके सामने दस-पैर वाला एक घोड़ा है जिसके पंख लगे हुए हैं । यदि आप मान लेते हैं बिना आँखें खोल कर देखे कि वह घोड़ा है, यह अंधविश्वास है । अंधविश्वासी लकीर का फ़क़ीर होता है । वैसे ही तार्किक मन भी रटी-रटाई बातें ही दोहराता है । तार्किक में भी एक प्रकार की कट्टरता होती है । उदाहरण के लिए, भारत में यह माना जाता है कि यदि आप किसी यात्रा में जा रहे हैं और जैसे ही आप यात्रा शुरू करने वाले हैं और उसके पहले दूध का कटोरा या दूध का कोई बर्तन गिर जाए तो यह अपशकुन होता है । अंधविश्वासी इस अपशकुन से डर जाता है और तमाम तरीक़े की चालीसा पढ़ना शुरू कर देता है । बचाव के लिए निदान करना शुरु कर देता है । भगवान से प्रार्थना शुरु कर देता है । और तार्किक व्यक्ति का क्या रवैया होता है ? वह इस अपशकुन को सिरे से ही नकार देता है । उसे यह पूरी बात बेतुकी लगती है । उसे दूध गिरने में और यात्रा में कोई संबंध समझ नहीं आता । अब कारण क्या है कि दूध का गिरना अपशकुन माना जाता है ? दूध का गिरना यह बताता है कि आप होश में नहीं हैं, आप निद्रा में चल रहे हैं, आपका ध्यान कहीं और है, शरीर यहाँ है मन कहीं और है । तो आप टकरा जाते हैं किसी चीज़ से और दूध गिर जाता है । इसका अर्थ है कि आप बेहोश हैं । यदि आप इस बेहोशी की अवस्था में यात्रा में जाएँगे तो बहुत संभावना है कि आप दुर्घटनाग्रस्त हो सकते हैं । कोई भी अनहोनी हो सकती है क्योंकि आप बेसुध हैं । तो जिन्होंने ऐसी चीज़ों को अपशकुन कहा वे हमें जगाना चाहते थे, “यदि दूध छलक गया है तो होश में आओ, जाग जाओ ।” अब यह बात ना अंधविश्वासी जानना चाहता है ना तार्किक जानना चाहता है । तो हम देखते हैं यहाँ कि चाहे वह तार्किक हो या अंधविश्वासी हो दोनों ही कट्टर हैं । अब यह दूध के गिरने के अपशकुन का यह स्पष्टीकरण सुनकर अंधविश्वासी को बड़ा सुकून मिल सकता है । उसे यह लग सकता है कि जिसको वैज्ञानिक दृष्टि से, तर्क की दृष्टि से नकार दिया गया था दरअसल वह नकारने योग्य नहीं था । दरअसल, उसमें भी कुछ अर्थ था । लेकिन फिर अंधविश्वासी चूक जाता है क्योंकि इस घटना को अपशकुन कहने का अर्थ यह था कि, “जागो” । लेकिन अंधविश्वासी तो फिर भी नहीं जगा । उसने सोये-सोये ही तर्क को सुन लिया, इस अर्थ को सुन लिया और उसको भी स्वीकार कर लिया बिना यह जानने के प्रयास किए कि जो अर्थ यहाँ बताया गया है अपशकुन का वह सही भी है या नहीं । बस उसे तो कुछ एक सहारा चाहिए, कोई आधार चाहिए जहाँ वह अपने अंधविश्वास को खड़ा कर सके । तो हम यहाँ आकर एक चीज़ देखते हैं कि समझ की जरूरत होती है जो की दुर्भाग्य से ना तार्किक उपयोग करता है ना अंधविश्वासी उपयोग करता है । दोनों की अपनी-अपनी परिपाटियाँ होती हैं । और बस दोनों अंधों के जैसे चलते ही चले जाते हैं ।
न केवल आम तर्कवादी, बल्कि बड़े-बड़े बुद्धिजीवी भी कभी-कभी अपने तर्क से अंधे होते हैं । ऐसा ही उदाहरण मुझे भारतीय गणितज्ञ रामानुजन की एक जीवनी में मिला । रामानुजन पूरी ज़िंदगी यह दावा करते रहे कि उनके जो गणितीय सूत्र हैं, जो उनकी गणित की प्रतिभा है, उसका स्रोत उनकी कुलदेवी हैं । रामानुजन ने 3500 से ज़्यादा गणितीय सूत्रों का प्रतिपादन किया । पर आश्चर्य यह था कि ज़्यादातर सूत्र उनके पास निष्कर्ष के रूप में ही आए । इसका अर्थ यह है कि उन्होंने कोई गणितीय रीति से ये सूत्र सिद्ध नहीं किए । यह उनके पास परिणाम के रुप में आए और बाद में उन्होंने उनमें से कुछ सूत्रों को सिद्ध किया । लेकिन क्योंकि उनके अंदर यह ज्ञान का विस्फोट हो रहा था तो उनके पास पर्याप्त समय नहीं था कि इन सारे सूत्रों को सिद्ध कर पाते, और उनकी बीमारियाँ इतनी ज़्यादा थीं कि वे ज़्यादा वक़्त उन्हीं में उलझे रहे । रामानुजन की मृत्यु के पश्चात विश्व के कई गणितज्ञों ने उन सूत्रों को सिद्ध करने का प्रयास किया । इसमें से एक गणितज्ञ थे अमेरिका के प्रोफेसर ब्रूस बर्नडट । उन्होंने काफी वक़्त लिया, और अंत में रामानुजन के सारे सूत्रों को सिद्ध कर दिया । लेकिन इन सूत्रों को सिद्ध करने के पश्चात उन्होंने यह दावा किया कि रामानुजन का जो देवी ज्ञान है वह देवी ज्ञान ना होकर उनके गणितीय तर्क से ही निकला है । उन पर कोई देवीय ज्ञान उद्घटित नहीं हुआ था, बल्कि उन्होंने ये सारी चीज़ें ख़ुद ही सिद्ध की हैं । प्रोफेसर ब्रूस ने कुछ ग़ज़ब तथ्य दिए अपने तर्क सिद्ध करने के लिए । रामानुजन भी यदि ये “तथ्य” सुनते तो हतप्रभ हो जाते । प्रोफ़ेसर ब्रूस ने कहा कि ग़रीब होने के कारण रामानुजन के पास कॉपी पैन जैसी चीज़ें नहीं थीं गणित करने के लिए । इसीलिए उन्होंने अपना सारा गणित स्लेट पर किया । उस पर लिखते थे, सिद्ध करते थे, मिटा देते थे, फिर लिखते थे । यह सारा का सारा गणित रिकॉर्ड नहीं हो सका । इसके बाद यह प्रश्न स्वाभाविक उठता है कि यदि रामानुजन ने ही यह सारी चीज़ें सिद्ध की थीं तो वे यह क्यों दावा करते थे कि उन्हें ज्ञान ऊपर से आता था ? इसका जवाब भी प्रोफेसर ब्रूस ने “अद्भुत विश्लेषण” से निकाला: उन्होंने कहा कि रामानुजन बीमारियों से पीड़ित थे और उन बीमारियों ने रामानुजन की स्मृति पर भी प्रभाव डाला था । उनकी स्मृति कमज़ोर हो गई थी इसलिए उन्हें स्वयं भी याद नहीं था कि उन्होंने इन सूत्रों को सिद्ध किया था या नहीं । अब प्रोफेसर ब्रूस ने सारे तथ्यों और अवधारणाओं को अपने अंदाज़ से एक तर्क की माला में पिरो कर दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दिया । ब्रूस की गणितीय बुद्धि यह मानने के लिए तैयार नहीं थी कि कोई देवी ज्ञान का स्रोत भी हो सकता है । और अपनी इस ज़िद में तो वे यहाँ तक पहुँच गए कि उन्होंने जिस व्यक्ति के सूत्रों पर शोध किया उसी व्यक्ति के बुनियादी ढाँचे को तहस-नहस कर दिया । यह होती है तार्किक बुद्धि जो बस अपनी ज़िद मनवाना चाहती है । इस तर्क में और अंधविश्वासी के तर्क में ज़्यादा अंतर तो नहीं दिखता ।
आगे, तर्कवादी भी कई प्रकार के होते हैं । अब जैसे कुछ मार्कसिस्ट तर्कवादी होते हैं । उन्होंने पूरी दुनिया को, पूरे मानव समाज को अमीर और ग़रीब श्रेणियों में बाँट कर रख दिया है । अब उनके हिसाब से और किसी प्रकार के लोग होते ही नहीं हैं । या तो लोग अमीर होते हैं या तो ग़रीब होते हैं । केपिटलिस्ट क्लास यानि पूँजीवादी वर्ग और वर्कर क्लास यानि श्रमिक वर्ग । उनके अनुसार, अमीर व्यक्ति हमेशा ग़रीबों का शोषण करता है । वे पूरी दुनिया को इसी दृष्टिकोण से देखना चाहते हैं । यह भी एक प्रकार की कट्टरता ही है । वह अपने आप को बदलना ही नहीं चाहते । उसके बाद, नारीवादी विचारक होते हैं, फेमिनिस्ट थिंकर्स । वे नारियों के अधिकारों की, उनके शश्क्तिकरण की बातें करते हैं । इन विचारकों की एक बहुत बड़ी जमात पुरुष वर्ग के प्रति दुर्भावना से भरी है । उनके हिसाब से, पुरुषों ने नारियों का हमेशा से शोषण किया है । ये दुर्भावना भी एक प्रकार का अंधविश्वास ही है । यदि एक मार्कसिस्ट और एक नारीवादी विचारक आपस में बैठकर मिल भी जाएँ तो दोनों एक दूसरे को ग़लत सिद्ध करने का प्रयास करेंगे । हैं दोनों ही तार्किक ! लेकिन एक एक प्रकार से तार्किक है इकोनॉमिक बेसिस पर, आर्थिक आधार पर, और दूसरा सामाजिक आधार पर ।
वैसे ये तर्क-युद्ध आस्तिकों और नास्तिकों के बीच में भी देखने को मिलते हैं । नास्तिक हमेशा बोलता है कि यदि भगवान होता है तो दिखाओ । अब बेचारा आस्तिक सिद्ध करने में लग जाता है कि भगवान तो आँखों से देखा ही नहीं जा सकता, वह तो इंद्रियों के पार का अनुभव है, अदृश्य है, अमूर्त है, वह मन में, विचार में पकड़ा ही नहीं जा सकता । और नास्तिक अड़ा है: दिखाओ; दिखाओगे नहीं तो मानूँगा भी नहीं । अब कभी नास्तिक से पूछो कि यदि आस्तिक को भगवान का अस्तित्व सिद्ध करना ज़रूरी है तो नास्तिक को भी भगवान का ना-होना सिद्ध करना ज़रूरी है । सिद्ध करो कि नहीं होता है । अब किसी की उपस्थिति सिद्ध करना हमें लगता है तार्किक, लेकिन किसी की अनुपस्थिति सिद्ध करना यह तो थोड़ी नासमझी सी लगती है । मैं एक बार अपने मित्र से बात कर रहा था – वे नास्तिक हैं – मैंने कहा, “ज़रा सिद्ध करिए कि भगवान नहीं होता ।” तो उन्होंने कहा, “देखिए, छोटे-छोटे बच्चों की मृत्यु हो जाती है कुपोषण से, युद्ध में हज़ारों लोग मारे जाते हैं । यह बात सिद्ध करती है कोई भगवान नहीं होता जो हमें प्रेम करता है । यदि होता तो वह यह सब होने नहीं देता ।” तो मैंने उनसे कहा कि, “यदि युद्ध में मारे गए लोगों से सिद्ध होता है कि भगवान नहीं है तो ऐसे करोड़ों लोग हैं जो युद्ध में नहीं मारे गए हैं । इससे यह भी सिद्ध होता है कि भगवान है । यदि युद्ध में मरना, युद्ध में मारे जाना भगवान के अस्तित्व को निरस्त करता है, तो जो कभी युद्ध में नहीं गए, जिन्हें कभी युद्ध की आग ने नहीं छुआ उनका होना भगवान के होने को सिद्ध करता है । वैसे ही यदि कुपोषण से मरने वाले बच्चे यह सिद्ध करते हैं कि उनकी फ़िकर करने वाला कोई पिता परमात्मा ऊपर नहीं बैठा है, तो ऐसे करोड़ों लोग भी हैं जो कुपोषण से नहीं मरते हैं, स्वस्थ जीवन जीते हैं, जिन्हें सुविधाएं मिलती है, उनका होना पिता परमात्मा का होना सिद्ध करता है ।”
अब ये लड़ाइयाँ क्यों चलती रहती हैं ? क्योंकि हममें से ज़्यादातर लोग किसी ना किसी विचारधारा को ज़ोर से पकड़ कर बैठे हुए हैं । हर कोई सामने वाले को अज्ञानी ही समझता रहता है । इस तरीक़े से कभी अंधविश्वास का निदान संभव नहीं है । अंधविश्वास का निदान शुरू तब होता है जब अंदर का दिया जलता है । उस प्रकाश में आप सत्य और असत्य को देख पाते हैं । दूसरी बात, अंधविश्वास से निपटने के लिए करुणा का होना बहुत ज़रूरी है । बुद्ध का यह शब्द बहुत ही प्रेमपूर्ण है । जिस छात्र ने मुझे फोन किया था उसे मैंने कहा कि, “आज तो तुम जाग गए और तुम्हें लगा कि पैसे से बैकुंठ नहीं खरीदा जा सकता । लेकिन हो सकता है पहले तुम भी इसी अंधविश्वास में पड़े हुए थे । आज तो तुम जाग गए, पर दूसरों को भी जागने का समय दो । उनकी निंदा ना करो, उनकी आलोचना न करो । यही करुणा है ।” जब आप शिखर में पहुँच जाते हैं तो आप यह जानते हैं कि आप भी कई बार फिसले थे, बार-बार नीचे पहुँचे थे, फिर चढ़े थे । जब आप शिखर में पहुँच जाए और नीचे से चलते हुए लोगों को फिसलते हुए देखकर उनकी निंदा करें तो फिर वे चढ़ नहीं पाएँगे । साथ ही यदि आप निंदा करते हैं तो आप कर क्या रहे हैं ? थोड़ा सोचिए । आप अपने अतीत की निंदा भी तो कर रहे हैं क्योंकि अतीत में आप भी तो वहीं थे । तो तर्क से ज़्यादा प्रेम और करुणा मानवता को अंधविश्वास से मुक्त करने के लिए ज़रूरी है । थम के, रूक के, थोड़ा ठहर के, लोगों को समय देना, लोगों को स्थान देना, बिना निंदा किए, उनके अंदर स्वयं समझ पैदा हो इस प्रकार की परिस्थितियाँ पैदा करना, कुछ भी उनके ऊपर ना लादना, ना अपने ऊपर लादना । और, एक बात मैं दोहराता हूँ कि जिन्होंने वाक़ई प्रकाश को जान लिया है, जिन्होंने अंतस आलोक को जान लिया है वे कभी भी किसी के अँधेरे से व्यथित नहीं होंगे । हाँ, वे सहायता ज़रूर करेंगे । उनके द्वार हमेशा खुले रहेंगे । वे अपना प्रकाश बाँटने के लिए सदैव तैयार रहेंगे । लेकिन यदि उस प्रकाश को कोई ग्रहण ना करना चाहे तो वे उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे । इसीलिए यह बहुत ही ज़रूरी है कि हम अपनी पूरी ऊर्जा, पूरा ध्यान स्वयं के विकास में लगाएँ, स्वयं का दिया जलाएँ सबसे पहले । जिस दिन वह दिया जल गया, फिर आनंद ही आनंद है । केवल तभी और तभी हम दूसरों की मदद कर पाएँगे, दूसरों को अंधकार से मुक्त कर पाएँगे ।

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