क्रोध से मुक्ति

क्रोध को एक विकराल समस्या माना जाता है । आधी से ज़्यादा मनुष्यता इससे पीड़ित है । हम सभी कभी-न-कभी इसकी आग से झुलसे ज़रूर होंगे । कभी हमने अपनी क्रोध की अग्नि से अपने आप को जलाया होगा, कभी दूसरों को । और जब कभी कुछ क्रोधी व्यक्ति एक साथ इकट्ठे हो जाएँ तो फिर ऐसा लगता है मानो दावानल पैदा हो गया हो । क्रोध से बचने का उपाय हम क्या करते हैं ? ज़बरदस्ती इसे दबाते हैं । लेकिन, यह दमन हमारे क्रोध को और ऊर्जा देता है, उसे आवेशित करता है, उसे और उग्र बना देता है । और जब कभी यह दमित क्रोध फूटता है तो ज्वालामुखी का विस्फोट ही होता है । गैस कुकर के वॉल्व को यदि हम कुछ देर के लिए बंद कर दें और भाप कहीं से निकले ही न तो क्या होगा ? आप जानते हैं क्या होगा ।
            यही हम करते आ रहे हैं क्रोध के बारे में । हम क्रोध को दबाते आ रहे हैं और यह दमन हमारे अंदर एक विकृति पैदा कर रहा है । जितना क्रोध दबाते जाते हैं उतना विनाशकारी रुप यह लेता जाता है । आइए हम एक प्रयोग के माध्यम से इसे समझने का प्रयास करते हैं । यदि आपको कभी खाँसी हो जाए तो आप उस खाँसी को दबाने का प्रयास करें । आपका पूरा शरीर विकृत होने लगेगा । आप इतना असहज महसूस करने लगेंगे । जितना इस खाँसी को दबाते जाएंगे उतना परेशानी में पड़ेंगे । आपका पूरा स्वास्थ्य गड़बड़ा जाएगा । आपको अंततः खाँसना ही पड़ेगा । और जब आप खाँसेंगे तो वह खाँसी असामान्य होगी । वह आपको पूरा का पूरा हिला कर रख देगी, क्योंकि जो खाँसी थोड़ी-थोड़ी बाहर निकल सकती थी उसे आपने रोक लिया । अब वह पूरा एकत्रित कचड़ा जब एक साथ निकलेगा, तो परेशानी तो पैदा करेगा ही ।
            क्रोध को रोकना भी ऐसा ही है जैसे खाँसी को रोकना । खाँसी को जब हम रोकते हैं तो हम यह महसूस कर पाते हैं कि दमन हमें मुश्किल में डाल रहा है क्योंकि यह शरीर के स्तर पर हो रहा होता है । लेकिन क्रोध का दमन मन के स्तर पर होता है, इसीलिए इसके दुष्परिणाम हमें स्पष्ट रुप से दिखते नहीं । जब हम थोड़ा होश में होते हैं तभी हमें यह समझ आता है ।
            हम क्रोध को दबाते क्यों हैं ? क्या हम क्रोध को खाँसी जितना सहज रूप से नहीं ले सकते कि जब खाँसी आ रही है तो खाँस लें और जब क्रोध आ रहा है तो क्रोधित हो जाएँ ? याद रखिए, यदि आप खाँसी को दबाते रहेंगे तो आप खाँसी से कभी मुक्त नहीं हो सकते, वैसे ही जब तक आप क्रोध को दबाते रहेंगे आप क्रोध से मुक्त नहीं हो सकते । लेकिन हमने क्रोध का दमन कहाँ से सीखा है ? हमने यह सीखा है नैतिकतावादियों से । हमें सिखाया गया है कि क्रोध बुरी चीज़ होती है, इसीलिए क्रोधी व्यक्ति बुरा होता है । चूँकि आप कभी भी बुरे नहीं होना चाहते, इसीलिए आप एक दिखावा करने लगते हैं कि आप क्रोधित नहीं हैं । और जितना दिखावा आप करते जाते हैं, जितना आपका यह झूठा चेहरा लोगों को पसंद आने लगता है, आप उतनी मुश्किल में पड़ते जाते हैं । क्योंकि फिर और, और, और दिखावे करने होते हैं, फिर और चेहरे ओढ़ने होते हैं अपने ऊपर, झूठे चेहरे । क्रोध तो कहीं गया नहीं होता । वह तो वहीं होता है पूरे वक़्त, आपके अंदर ही मौजूद, निकलने के लिए तत्पर, आतुर । बस एक मौक़ा ढूंढ रहा होता है बाहर निकलने का । जितना यह जंगली बनता जाता है उतना आप इसे और दबाने का प्रयास करते जाते हैं ।
            हमें यह बताया गया है कि क्रोध बुरा होता है । ओशो हमेशा कहते हैं कि जब भी हम किसी चीज़ की निंदा करते हैं हम उसके विरोध में होते हैं । और जब कभी हम विरोध में होते हैं तो हम अपनी उर्जा व्यर्थ गवाँ रहे होते हैं । इसीलिए हम जितना क्रोध की निंदा करते हैं, जितना इसे बुरा कहते हैं, उतना ही यह हम पर हावी होता जाता है । यदि आप किसी डॉक्टर के पास खाँसी के इलाज के लिए जाएँ और इलाज के रूप में डॉक्टर आपको यह कहे कि, “आपको खाँसना नहीं चाहिए । खाँसी बुरी चीज़ होती है ।” तो आप क्या करेंगे ? आप उससे यही कहेंगे कि, “यह बात तो मैं भी जानता हूँ कि मुझे नहीं खाँसना है । मुझे खाँसी से परेशानी है, मुझे इससे निदान चाहिए; इसीलिए तो मैं आपके पास आया हूँ । आप मुझे यह क्या इलाज दे रहे हैं ? क्या मुझे खाँसने का शौक़ है ? क्या मुझे मज़ा आ रहा है खाँसने में ? और इलाज के नाम पर आप यह सलाह दे रहे हैं कि मैं न खाँसूं !” और यही हमारे नैतिकतावादी, तथाकथित साधु-संत कर रहे हैं । वे हमें सिखा रहे हैं कि, “क्रोधित मत हो ।” कौन होना चाहता है क्रोधित ? मैं आज तक किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिला जो अपने क्रोध से संतुष्ट । जिसे क्रोधित होने में आनंद आता हो । किसी को नहीं आता । लेकिन क्या यह कह देने से कि, “क्रोध मत करो” समस्या का हल हो जाता है ? क्या निंदा करने से किसी विकार का इलाज हो जाता है ? नहीं होता । हो सकता होता तो दुनिया में कोई विकार होते ही नहीं । क्योंकि हम पूरे वक़्त इन विकारों की–क्रोध की, काम की, लोभ की–आलोचना ही कर रहे हैं । तो निंदा से तो कोई चीज़ कभी हल होती नहीं ।
            किसी भी बीमारी का इलाज होता क्या है ? सबसे पहले हम यह जानने का प्रयास करते हैं कि वह बीमारी क्या है, उसका स्रोत क्या है । दूसरा चरण है उस बीमारी का उपयुक्त इलाज ढूंढना । और तीसरा चरण है उस इलाज को अपनाना । तो ये तीन चरण हैं । क्रोध के संबंध में भी हमें यही समझ पैदा करनी होगी । जब तक हम इस समझ से क्रोध को नहीं जानेंगे तब तक क्रोध का इलाज कभी हो ही नहीं सकता । हम कितनी ही निंदा करते रहें, क्रोध वहीं होगा । तो आइए हम क्रोध के स्रोत को जानने का प्रयास करते हैं ।
            क्रोध आता कहाँ से है? सबसे पहले हम अपनी दिनचर्या को देखें ज़रा । हममें से ज़्यादातर लोगों की दिनचर्या बड़ी प्रतिक्रियात्मक है, रिएक्शनरी । हम प्रतिक्रिया बहुत जल्दी करते हैं । कोई भी घटना घटे तुरंत हम प्रतिक्रिया करते हैं । यह प्रतिक्रिया क्रोध का एक रुप ही है । हम किसी घटना को पूर्णता में देखते ही नहीं, उसे समझते ही नहीं । आधा-अधूरा देखते हैं और फिर प्रतिक्रिया करते हैं । और यह प्रतिक्रिया धीरे-धीरे क्रोध का रुप ले लेती है । मुझे एक घटना याद आती है : मैं एक स्कूल में कार्यरत था । वहाँ मेरा एक मित्र भी कार्य करता था । एक दिन, एक वरिष्ठ शिक्षिका ने कहा कि मैं अपने मित्र को जाकर बोलूँ कि उनका जो टाइम-टेबल है, समय-सारणी, वह बदल गया है । मैं यह संदेश लेकर अपने मित्र के पास गया और कहा कि, “तुम्हारे टाइम-टेबल में कुछ बदलाव है ।” बस इतना सुनना था कि वह भड़क उठा, फूट पड़ा : “कितने बदलाव होंगे मेरे टाइम-टेबल में ? दो महीने से यही चल रहा है । कभी यह क्लास देते हैं, कभी वह क्लास देते हैं, कभी यहाँ भेजते हैं, कभी वहाँ भेजते हैं । मैं परेशान हो चुका हूँ । सबसे ज़्यादा क्लासेस मुझे पढ़ानी पड़ती हैं, सबसे ज़्यादा बोझ मेरे ऊपर है । और फिर यह बदलाव । अभी ये फिर मुझे और क्लासेस देना चाहते हैं ।” वह भड़क उठा । मैंने उसे कहा कि, “ज़रा शांत तो हो जाओ, ज़रा सुन तो लो मैं कह क्या रहा हूँ ।” तो वह फिर बोला, “मुझे नहीं सुनना । मैं तंग आ चुका हूँ । मैं यह नौकरी छोड़ दूँगा । मुझे नहीं करना यहाँ काम ।” मैं शांत होकर उसे सुनता रहा । जब वह शांत हुआ तो मैंने उसे कहा कि, “संदेश यह है कि आपके कुछ लेक्चर्स कम कर दिए गए हैं ।” उसने यह बात सुनी । फिर क्या होना था ? थोड़ा अचंभित हुआ । उसकी प्रतिक्रिया ने उसे यह देखने ही नहीं दिया उसे कि हो सकता है कि यह संदेश कुछ अलग हो ।
            हम चीज़ों को पूर्णता में समझते ही नहीं । बस कोई घटना घटती है और हम उसकी व्याख्या शुरू कर देते हैं । फिर हम उससे अपने ही निष्कर्ष निकालते रहते हैं । यही प्रतिक्रिया है । आप कहीं से गुज़र रहे हों और कोई व्यक्ति आपको देखकर मुस्कुरा दे तो आप उस मुस्कान में भी कुछ अर्थ ढूंढने लगते हैं । आपको लगता है शायद उसने आपका मखौल उड़ा दिया है । वह साधारण सी, सहज सी मुस्कान में भी आपको कोई रहस्य दिखने लगता है, किसी षड्यंत्र की गंध आने लगती है । और उस व्यक्ति को तो पता ही नहीं होता कि उसकी मुस्कान को तोड़-मरोड़ कर सामने वाले ने कितने अर्थ निकाल लिए हैं ।
            आप देखें अपनी दिनचर्या को : क्या पूरे वक़्त आप प्रतिक्रिया नहीं कर रहे होते ?
            इन प्रतिक्रियाओं को रोकना कोई इतना असंभव काम नहीं है । इस पर प्रयोग करें । ज़रा शांति से, पूर्णता से चीज़ों को देखें । जल्दी भड़कें न । इस प्रयोग से दो चीज़ें होंगी : पहली, आप यह देख पाएंगे कि सत्य हमेशा वह नहीं होता जो आप सोचते हैं । दूसरी, जितना आप शांत होते जाएंगे, प्रतिक्रियाएँ जितनी कम होंगी, उतना क्रोध संयमित होता जाएगा । प्रतिक्रियाएँ क्रोध का भोजन है । जितना आप शांत होकर, रूककर चीज़ों को देखते हैं, उतनी समझ आप में पैदा होती है । नहीं तो, आप ज़िंदगी भर प्रतिक्रियाएँ ही करते रह जाते हैं ।
            आप कभी ग़ौर करके देखिए कि जब आप चीज़ों को जज करते हैं, उनका मूल्यांकन करते हैं, जब लोगों के बारे में कुछ राय बना लेते हैं, वह राय हमेशा ही ग़लत होती है । हाँ, कभी-कभी संयोगवश आपके अंदाज़े सही हो भी सकते हैं । लेकिन यह अँधेरे में तीर मारने से ज़्यादा कुछ भी नहीं । सौ तीर मारे तो कभी-कभी एक तीर लग ही जाता है निशाने पर । तो आपके अंदाज़े भी दूसरों के बारे में, आपकी राय, आपके निर्णय दूसरी परिस्थितियों के बारे में भी कभी-कभी लग जाते हैं निशाने पर । लेकिन यह न सोचें कि आप बड़े निशानची हैं, कि आपको धनुर्विद्या आती है ।
            तो, अपने पूर्वाग्रहों से बाहर निकलें । वरना आप अपना और दूसरों का बहुत नुक़सान करेंगे । मैं एक बार अपने एक मित्र के यहाँ गया । उन्हें ब्लड प्रेशर(बीपी) की शिकायत थी । अचानक उनका बीपी कम हो गया । जैसे-तैसे मैंने उन्हें संभाला । उनके पड़ोस में ही एक डॉक्टर रहते थे । तो मैंने कहा कि, “चलो डॉक्टर से मिल लेते हैं–मित्र और डॉक्टर बड़े अच्छे मित्र भी थे । जब मैंने उन्हें यह सलाह दी तो उन्होंने बोला कि, “नहीं, अब मैं उस डॉक्टर से बात नहीं करता ।” मैंने पूछा, “क्या बात हो गई, बात क्यों बंद हो गई ?” तो वे बोले कि, “यह जो डाक्टर है, यह बड़ा मित्र बना फिरता था मेरा, बड़ी दोस्ती दिखाता था । और देखो अब यह मेरे घर के सामने अपनी गाड़ी खड़ी कर देता है ।” तो मैंने बोला, “हाँ, फिर परेशानी क्या है ? खड़ी रहने दो गाड़ी । जगह है वहाँ ।” तो वह बोला, “ऐसे-कैसे वह गाड़ी खड़ी कर सकता है मेरी जगह में ?! वह यहाँ गाड़ी खड़ी करेगा तो मैं कहाँ गाड़ी खड़ी करूंगा । हम तो दोस्त थे । हमने यह जगह भी बाँट ली थी अपनी-अपनी कि वह कहाँ गाड़ी खड़ी करेगा और मैं कहाँ गाड़ी खड़ी करूँगा ।” तो मुझे आश्चर्य हुआ और मैं बोला कि, “तुम्हारे पास तो गाड़ी है ही नहीं अभी । फिर झगड़ा क्यों ?” तो वे बोले कि, “कभी तो होगी । मैं तो बस लेने ही वाला हूँ गाड़ी । जब गाड़ी आ जाएगी तो फिर कहाँ खड़ी करूंगा ?” ये मरने के लिए तैयार हैं । बीपी कम है, मृत्यु हो सकती है । लेकिन इतना बलिदान कि अपने झूठे मतों के लिए अपने आप को शहीद करने के लिए तैयार हैं ! डॉक्टर से नहीं मिल सकते । और अजीब सी बात है कि एक ऐसी चीज़ के लिए बात बंद कर दी जो थी ही नहीं । फ़ैज़ साहब याद आते हैं यहाँ : “वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था / वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है ।” मर जाएंगे लेकिन आँख नहीं खोलेंगे । बीपी का रोग कहाँ से हुआ ? इसी अंधेपन से हुआ, इन्हीं प्रतिक्रियाओं से हुआ । और उस डॉक्टर को शायद पता भी नहीं है आज तक कि इन सज्जन ने उनसे बात करनी क्यों बंद कर दी है । तो अपना बीपी तो बढ़ाया उस डॉक्टर का बीपी भी बढ़ा दिया । अब वह ग़रीब भी सोचता रहता होगा कि इतनी मधुरता थी संबंध में, इतना याराना था, जय और वीरु जैसा, अचानक क्या हो गया यह ? हम भी ऐसी कितनी ही नासमझियों में जीते रहते हैं ।
            अपनी प्रतिक्रियाओं को थोड़ा जाग कर देखें, पेनीट्रेट करें उन्हें । आपने जो दूसरों के संबंध में राय बना ली है उससे बाहर निकलें । इस जजमेंट केज से बाहर निकलें और देखें कि ज़रुरी नहीं है कि लोग वैसे हैं जैसे आपको लगते हैं ।
            तो सबसे पहली बात : हमें प्रतिक्रियाओं से बचना है । थोड़ा होश में रहें और देखें कि जैसे ही कोई घटना या कोई व्यक्ति आपके अंदर आक्रोश पैदा करने लगे तो शांत हो जाएं । आक्रोश को दबाएं न । बस शांत होकर देखें कि क्या आक्रोशित होने की ज़रूरत है ? बस इतना देखना आपके अन्दर एक गहरी समझ पैदा करेगा और आक्रोश शांत होगा ।
            और एक बात मैं फिर दोहराऊंगा कि अभिव्यक्त क्रोध दमित क्रोध से हमेशा ही अच्छा होता है । Expressed anger is better than repressed anger । क्योंकि जो क्रोध दबा दिया जाता है वह अंदर सुलगता रहता है । तो यदि क्रोध की भाप आपके गैस कुकर के अंदर पैदा हो गई है तो बहुत ज़रूरी है कि उसे बाहर निकालें । फिर यह देखें कि दुबारा वह भाप पैदा न हो प्रतिक्रियाओं से । दूसरी बात, कम्पेशन यानी करुणा का भाव आपको अपने अंदर लाना होगा । क्रोध का एकमात्र इलाज करुणा है । जब आप किसी व्यक्ति से क्रोधित होते हैं तो बस इतना जानिए कि यदि आप भी उस स्थिति में होते तो आप वही करते जो वह व्यक्ति कर रहा है । यह छोटी सी समझ कि हम और आप एक दूसरे से इसलिए अलग हैं क्योंकि हमारी परिस्थितियाँ अलग हैं । कोई हिंदू है, कोई मुस्लिम है; कोई शांत है, कोई क्रोधित है । हर एक व्यक्ति अलग-अलग परिस्थितियों में पैदा होता है, पलता है, बड़ा होता है । न केवल इस जन्म बल्कि न जाने कितने पूर्व जन्मों के संस्कार इकट्ठे होते हैं। एकहार्ट टोली कहते हैं कि, “यदि आपकी परिस्थिति भी वही परिस्थिति होती जो अगले की है और आपका अतीत भी वही अतीत होता जो अगले का है, तो आप भी वही होते जो वह है ।” यह समझ आपके क्रोध को शांत करने में बहुत ही सहायक होगी । और इस समझ को पैदा करने के लिए कोई तपस्या, साधना, व्रत, यज्ञ-हवन या कर्मकांड नहीं करना है, बस थोड़ा सा जागना है ।
            क्रोध से मुक्ति का उपाय करुणा है–दूसरों के प्रति, और सबसे पहले स्वयं के प्रति । आपको स्वयं को स्वीकार करना होगा । आपको यह देखना होगा कि स्वयं की निंदा नहीं करनी है यदि आप क्रोधित होते हैं तो । दरअसल, हमें यह बताया गया है कि कुछ चीज़ें अच्छी हैं, कुछ चीज़ें बुरी हैं । जो अच्छी चीज़ें करता है वह अच्छा व्यक्ति है और जो बुरी चीज़ें करता है वह बुरा व्यक्ति है । और इसके कारण लगभग पूरी दुनिया ही बुरी हो चुकी है । कुछ लोग सच्चे हैं, ईमानदार हैं; वे उन बुराइयों को छुपाते नहीं । कुछ झूठे लोग हैं–और इनकी संख्या बहुत बड़ी है–जो इन्ही विकारों में फँसे हुए हैं लेकिन एक चोला ओढ़ के रखा है, एक मुखौटा पहन रखा है । और स्वयं को और दूसरों को छल रहे हैं । यदि आपने भी ऐसा कोई मास्क पहना है तो इसे उतारिये । अपने आप को आईने में देखिए, होश के आईने में । आपका चेहरा सुंदर है या कुरूप है, कम-से-कम आपका तो है ।
            वैसे भी, कोई भी कुरूप नहीं होता । कुरुपता भी हमारा निर्णय ही है, कुरुपता भी हमारी व्याख्या ही है । वह जो कुरूपता आपको दिखती है अपने आप में, वह तुलना की कुरुपता है–रेलेटिव, सापेक्षिक । हम दूसरों से अपने आपकी तुलना करते हैं और हमें लगता है हम कुरूप हैं । हमें लगता है कि हम कुरूप हैं क्योंकि हम क्रोधित होते हैं, और अगला व्यक्ति सुंदर है क्योंकि वह शांत है । इन निर्णयों को जड़ से उखाड़ कर फेंक दीजिए ।
            इस बात को जानना बहुत सरल है कि क्या आपने अपने आपको को स्वीकार कर लिया है । जब आपके अंदर दूसरों के प्रति स्वीकार भाव पैदा होने लगता है, जब आप दूसरों की निंदा, आलोचना बंद कर देते हैं, तब आप यह जान लें कि आपने स्वयं को स्वीकार कर लिया है । इस स्वीकार से करुणा पैदा होती है ।
            जिसने करुणा की सुंदरता को जान लिया, उसके लिए क्रोध असंभव है । जो करुणावान व्यक्ति होता है–कोई बुद्ध, कोई जीसस, कोई ओशो, कोई मोहम्मद–वह स्वत: ही शांत होता है । शांत होना उसके लिए कोई प्रयास नहीं होता है । कहते हैं मोहम्मद को कभी ग़ुस्सा नहीं आता था । मोहम्मद की सफलता का सबसे बड़ा राज़ यही था कि उन्हें कभी ग़ुस्सा नहीं आया । एक बार मैं अपने उस्ताद के साथ संगीत का रियाज़ कर रहा था । आसपास कुछ धार्मिक शोर-गुल चल रहा था–आप जानते ही हैं भारत में धार्मिक शोर-गुल, holy noise कितना होता है–तो उसको सुनकर उस्ताद ने कहा कि, “देखो हम इस छोटी सी चीज़ से, इस शोर से व्यथित हो जाते हैं, और मोहम्मद को देखो उन पर क्या ज़ुल्म नहीं हुए, कितनी प्रताड़ना सही, कितनी यातनाएँ सही, फिर भी कभी क्रोध नहीं आया ।” तो शांतचित्त होना करुणावान व्यक्ति का पहला लक्षण होता है ।
            दूसरी बात : चूँकि हमारे क्रोध के संस्कार बहुत गहरे हैं तो उनसे मुक्त होने में हमें समय लगेगा । इसीलिए धैर्य भी रखें । धैर्यवान होना बहुत ज़रूरी है । जन्मों-जन्मों की बीमारी रात भर में ठीक नहीं हो सकती । जितना आप धैर्य रखेंगे स्वयं के साथ उतना आप शांत रहेंगे ।
            और आख़िर में मैं आपको यही सलाह दूँगा कि सक्रिय ध्यान की कुछ विधियाँ हैं ओशो की उन पर थोड़ा प्रयोग करें । आपके अचेतन में जितने भी विकार भर चुके हैं उनको बाहर निकालने में, उन्हें उलीचने में सक्रिय ध्यान बहुत ही प्रभावी है |
           तो प्रयास करें हर एक स्तर पर और आप देखेंगे कि क्रोध से लड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है । क्रोध कोई दुश्मन नहीं है । दरअसल, जितना आप शांत होते जाएंगे आपको ख़ुद ही लगेगा कि क्रोध है ही नहीं । क्रोध बस एक लहर है और आप जब अपने अंदर के समंदर में उतरने लगेंगे तो आपको दिखेगा कि वह लहर मात्र सतह पर है । गहराई में, अपने केंद्र में आप हमेशा ही शांत हैं ।

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