संवेदनशीलता

एक बार की बात है: हम कुछ लोग एक निर्जन स्थान पर ध्यान कर रहे थे। निस्तब्ध मौन! पेड़, पौधे, पक्षी सभी शांत! पूर्णिमा की रात थी। चाँद की छटा अद्भुत थी। हम सब उसे मंत्रमुग्ध निहार रहे थे। तभी हम इस सौन्दर्य पर चर्चा करने लगे। इसी बीच किसी ने एक चुटकुला कहा और हम सब ठहाका मार कर हंस पड़े। हमारा ठहाका पूरे वातावरण में गूँज उठा। फिर अचानक सब कुछ शांत। इस क्षण में हमें एक अनुभूति हुई: हमें ऐसा लगा जैसे हमने प्रकति की नींद में खलल डाल दिया हो। मानो शांति से सो रहे थके, हारे पेड़, पौधों, पशु, पक्षियों को जगा दिया हो। उस दिन हमने ये सीखा कि हमें समस्त जगत के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। अस्तित्व ने संवेदनशीलता का पाठ सिखाया कि हर एक प्राणी से हमें शांति और प्रेम से पेश आना चाहिए। ये संवेदनशीलता ही निजता का सच्चा सम्मान है।
            आम तौर पर हम नींद में होते हैं। जो नींद में है, वह असंवेदनशील होता है; क्योंकि वह बेहोश है। हम होश में हैं या बेहोश इसका पता बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है। यदि हम अपनी दिनचर्या पर ध्यान दें तो हम पाएंगे कि हम अपनी आसपास की चीजों से बड़ी कठोरता से पेश आते हैं। हमारे दरवाजा खोलने, बंद करने का ढंग, कपड़े धोते समय, पानी का नल बंद, चालू करते समय, किसी भी चीज़ को उठाते, रखते समय, हम असंवेदनशील होते हैं। हमारे तरीकों में कोमलता नहीं होती। बल्कि एक हिंसा और आक्रोश का भाव होता है।
            जैन धर्म के मानने वालों में एक प्रथा प्रचलित है: मुँह को हमेशा कपड़े से बाँध कर रखना। कारण है: बात करते समय बहुत सारे छोटे-छोटे जीव मुँह के अंदर आकर मर जाते हैं। ये प्रथा संवेदनशीलता का एक अनुपम उदाहरण है। जिस व्यक्ति ने पहली बार ये नियम बनाया होगा वह निश्चित ही बड़े कोमल हृदय वाला होगा। प्रेमपूर्ण और जागा हुआ।
            तो जागरूक जीवन ही संवेदनशीलता की कुंजी है। क्योंकि जो जागा न हो वह चीज़ो को कभी गहराई में नहीं समझ सकता, वह केवल सतह पर ही रहता है। वह किसी नियम के भाव को ना समझ कर, शब्दों में ही उलझकर रह जाता है; उसकी आत्मा में ना डूबकर, ऊपरी खोल से ही चिपका रह जाता है। ऐसा व्यक्ति कभी संवेदनशीलता की सुंदरता को नहीं जान पाता। मुझे एक घटना याद आती है: एक बार मैं ट्रेन में सफर कर रहा था। मेरे सामने वाली सीट पर एक सज्जन अपने मुँह पर कपड़ा बांधे बैठे थे। एक बार उनके पास से एक वेंडर निकला। उसने ग़लती से इन सज्जन के जूते पर ठोकर मार दी। फिर क्या था वो वेंडर पर बरस पड़े। उसे बड़ी खरी-खोटी सुनाई। आगे, आसपास कई बच्चे खेल रहे थे। जब कभी उनका कोई खिलौना, या ऐसी ही कोई चीज़ सज्जन पर आ गिरती, तो वे क्रुद्ध हो उठते। उन्हें ज़ोर से डाँटते। अब ये व्यक्ति छोटे-छोटे जीवों के प्रति तो संवेदनशील होने का स्वांग मात्र ही रच रहा है। उसने संवेदनशीलता को अपने पर थोप लिया है। अंदर तो वही कटुता, वही चिड़चिड़ाहट।
            सच्ची संवेदनशीलता होशपूर्ण जीवन से ही आती है। जीवन को शुद्ध आँखों और खुले हृदय से देख पाने से, ना कि किसी सिद्धान्त के चश्में से।
            जो असली संवेदनशीलता को जानता है वह इसे हर किसी के साथ बाँटता है।और एक संवेदनशील हृदय अस्तित्व के आशीष को ग्रहण कर पाने के योग्य हो जाता है। वो महसूस कर पाता है अहर्निश प्रेम को चारों और। जो देने के लिए अपने हृदय के द्वार खोलता है, वह पाने का अधिकारी भी बन जाता है। क्योंकि उसी द्वार से उसके अंदर परमात्मा प्रवेश कर जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *