मौन और संगीत

भाषा विज्ञान के अनुसार, मौन और संगीत दोनों विरोधार्थी शब्द माने जाते हैं । ऐसा माना जाता है कि जहाँ मौन है वहाँ संगीत नहीं हो सकता, जहाँ संगीत है वहाँ मौन नहीं हो सकता । जब मौन अनुपस्थित होता है तो संगीत उत्पन्न होता है और जब संगीत अनुपस्थित होता है तो मौन उत्पन्न होता है । अर्थात मौन और संगीत का सहअस्तित्व सम्भव नहीं है । एक का न होना दूसरे के होने के लिए ज़रूरी माना जाता है । लेकिन सत्य इसके विपरीत है । सत्य यह है कि बिना संगीत के मौन सम्भव नहीं है और बिना मौन के संगीत सम्भव नहीं है ।
            यह एक बहुत बड़ा विरोधाभास है कि मौन और संगीत एक दूसरे को पैदा करते हैं । इस विरोधाभास को समझने से पहले हम अंतर्विरोध और विरोधाभास का अंतर समझें । अंतर्विरोध का मतलब है दो घटनाएं एक दूसरे के इतने विपरीत है कि दोनों का सहअस्तित्व सम्भव नहीं है । दोनों में से एक घटना ही सम्भव हो सकती है । उदाहरण के लिए : यदि हम कहें कि आज का तापमान १०0C है और फिर हम यह कहें कि आज बहुत गर्मी है । तो यह अंतर्विरोध है । १०0C और आज बहुत गर्मी है ये दो तथ्य एक साथ सही नहीं हो सकते । वैसे ही, यदि हम यह कहें कि आज आसमान साफ़ है और साथ ही यह कहें कि बारिश हो रही है । यह अंतर्विरोध है ।
            विरोधाभास का शाब्दिक अर्थ है विरोध का आभास । मतलब विरोध नहीं है महज़ उसकी प्रतीति है । यह आभास सतह पर होता है, ऊपरी तौर पर । दो घटनाएँ, दो तथ्य, या दो व्यक्ति एक दूसरे के विरोध में हैं तो यह हो सकता है महज़ विरोधाभास हो । हो सकता है केन्द्र में ये घटनाएँ एक दूसरे के साथ आपसी समन्वय में हों । यह है विरोधाभास । अब उदाहरण के लिए : शाम को परिभाषित कीजिए । यह एक समय है जब न रात होती है न दिन होता है । या एक समय है जब रात भी होती है और दिन भी होता है । दिन और रात एक साथ होना सम्भव लगते नहीं । इनमें विरोध लगता है । ऐसे ही उषा काल को परिभाषित कर सकते हैं । बिल्कुल सुबह-सुबह, जब अँधेरा हल्का पढ़ने लगता है, अँधेरे का पर्दा झीना-झीना होने लगता है, और उसकी दूसरी ओर से प्रकाश झाँकना शुरू कर देता है तब न रात है, न दिन है । और रात भी है, और दिन भी । यही विरोध प्रतीत होता है । लेकिन केंद्र में जाकर दोनों घटनाएँ एक साथ सत्य हो जाती हैं । संध्या और उषाकाल दोनों दिन भी हैं और रात भी । यही है विरोधाभास । आइये एक और उदाहरण लें : यदि कोई कहे कि स्वार्थ ही परमार्थ है तो यह एक विरोधाभास होगा । जो स्वार्थ है वो अपने हित के लिए ही काम करेगा । दूसरे के हित के लिए सोचेगा भी नहीं । फिर वह परमार्थी कैसे हो सकता है ? यह प्रश्न इसीलिए उठता है क्योंकि हम स्वार्थी शब्द का अर्थ समझते नहीं । स्वार्थी का अर्थ है जिसने स्व यानी खुद को, स्वयं के अर्थ को, निधि को, सम्पदा को जान लिया है । जिसने अपनी निजता को पा लिया है । जो अपने में डूब गया है । और स्वयं के अंतस्थ के रहस्यों को जान लिया है । जिसने स्वयं की सम्पदा को जान लिया है वही पर यानी दूसरों को उनकी सम्पदा के बारे में बता सकता है । जिसने स्वयं के अर्थ को जान लिया है उसे दूसरों से कुछ चाहिए नहीं क्योंकि उसके पास स्वयं की सम्पदा है जो पर्याप्त है । वह दूसरों की भी मदद कर सकता है उनकी सम्पदा जानने में । यह है स्वार्थी ही परमार्थी है ।
            विरोधाभास को समझना बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि जैसे-जैसे हम अपने अंतस्थ में जाते हैं पाते हैं कि पूरा अस्तित्व ही विरोधाभासी है ।
            जो आभास में उलझ गया वह सत्य को नहीं जान पाएगा । आभास और सत्य में अंतर करना बहुत ही महत्वपूर्ण है ।
           यदि हम वापस मौन और संगीत के विरोधाभास पर आएँ तो हम देखते हैं कि जब तक हम शांत नहीं हो जाते हम आसपास की आवाज़ें सुन नहीं सकते । एक बार की घटना है : मैं एक शांत स्थान पर बैठा हुआ था । अचानक पास के ही पेड़ पर कोयल आई और उसने खुले गले से आवाज़ लगाई । जैसे हमारे उस्ताद कहते हैं कि खुले गले से गाया करो वैसे ही कोयल के उस्ताद ने भी कहा होगा ! तो उसने भी आवाज़ लगाई । उसकी खनखनाती आवाज़ पूरे आसपास के सन्नाटे में ऐसी गूँज गई ! बाढ़ आ गई हो जैसे मिठास की ! उस आवाज़ को सुन कर मेरे भीतर कुछ हुआ । मैं स्तब्ध हो गया ! रूक गया उसी क्षण में । इतना सुन्दर था सब कुछ ! और मैंने अपने भीतर के मौन को गहराते देखा उस संगीत से, जैसे मैं डूब गया अपने अंदर के मौन में । उस संगीत ने मुझे इतना शांत कर दिया । जैसे मैं शांत हुआ एक घटना और घटी । मुझे दूर से आते एक पक्षी की आवाज़ सुनाई दी जो कि पायल की छनक जैसी थी । उस आवाज़ का असर यह हुआ कि मैं और गहरे मौन में पहुंच गया । कोयल की आवाज़ ने मुझे मौन में पहुँचाया । और जब मौन में पहुँचा तो फिर पायल की छनक सुनाई दी । और सूक्ष्म स्वर सुनाई दिए । फिर अनुभूति हुई कि संगीत सुनने के लिए शांत होना आवश्यक है ।
            इस घटना के बाद लगभग सात दिनों तक लगातार, लगातार, मैं नई-नई आवाज़ें सुनता रहा । आश्चर्य यह था कि मैं उन्हीं स्थानों पर बैठा करता था जहाँ मैं 20-25 सालों से बैठा करता था । उन्हीं स्थानों पर नई-नई आवाज़ें ! मौन और संगीत का लुका छिपी का खेल : मौन आता था फिर उसके पीछे संगीत आता था । मौन संगीत को गहराता था और संगीत मौन गहराता था । पहली बार मुझे यह बात समझ आई कि संगीत ही मौन है और मौन ही संगीत है । यह विरोधाभास था । जितनी दूर से आती आवाज़ें सुन पाता था उतना आसपास की आवाज़ों के प्रति मैं सचेत होने लगा । फिर तो बस कमाल होने लगा ! मैंने पहली बार यह महसूस किया कि जब हम रेत के उपर चलते हैं तो उसके कण आपस में जो घर्षण करते है उस तक से संगीत पैदा होता है । सीढ़ियों पर पदचाप का संगीत होता है । हर एक जगह बस संगीत था ! यह सारा संगीत हर क्षण मौजूद था । बस मैं ही मौन नहीं था ।
            हमारी संगीत और मौन की समझ अधूरी सी है । आपने शायद इस बात पर ध्यान दिया होगा कि बहुत सारे लोग अपने कान में हैडफोन लगाए संगीत का आनंद लेते दिखाई देते हैं । हमें लगता है वे संगीत प्रेमी हैं । वे संगीत प्रेमी नहीं हैं, वे संगीत से घृणा करते हैं । यह भी एक विरोधाभास है । समझें इस बात को कि मैं कहना क्या चाहता हूँ । आप हैडफोन लगाते कब हैं ? सोच के देखिए । जब आप अकेले होते हैं । जब आप स्वयं से भागना चाहते हैं । जैसे कि जब आप पढ़ने या काम करने जा रहे होते हैं और मानलो आपका स्कूल या कार्यक्षेत्र १ घण्टे दूर है तो आप १ घण्टे की नीरसता से बचने के लिए संगीत सुनने लगते हैं । अब आपने अपने अंदर मौन तो पैदा होने दिया ही नहीं । इससे पहले वह पैदा हो भी पाता आपने संगीत से उसे भरना शुरू कर दिया । अब वह संगीत संगीत न होकर शोर हो गया जिससे आपने स्वयं को भर लिया । जब आप पहले से ही भरे हैं तो आपको संगीत सुनाई कैसा देगा ? संगीत को ग्रहण करने के लिए विशेष तैयारी की आवश्यकता होती है । और अस्तित्व कहीं न कहीं वह तैयारी करवा रहा होता है । कई बार ऐसे क्षण आते हैं कि अस्तित्व चाहता है कि हम मौन हो जाएं, बैठ जाएं । लेकिन जैसे ही हम अकेले होते हैं हम “संगीत सुनना” शुरू कर देते हैं । हम मौन तो हुए ही नहीं, हम ख़ाली तो हुए ही नहीं कभी, तो संगीत अंदर आएगा ही कैसे?
            जो संगीत समझना चाहता है उसे मौन होना पड़ेगा । संगीत कोई समय व्यतीत करने का साधन नहीं है । संगीत माध्यम है अपने अंतरतम में गूँजरित संगीत को पहचानने का । ये बाह्य संगीत अंदर अहर्निश बहते संगीत की एक झलक मात्र है । और ये अंतस संगीत मौन की बाँसुरी से ही बहता है । इसीलिए जब कभी अंदर का ख़ालीपन आए तो उससे भागें मत । उसे देखें । हैडफौन न लगा लें, संगीत न शुरू कर दें गाड़ी में । मौन हो जाएँ । अंदर से आप जितने गहरे मौन को जानते जाएगें उतने ही गहरे संगीत को जानते जाएगें ।

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