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Kapil Chaudaha

ओशो ने कहा है कि जब कभी भी आनंद का फूल खिलता है वह सहज ही अपनी सुगंध चारों ओर बिखेरना शुरू कर देता है । ओशो के द्वारा बताए हुए प्रेम और ध्यान के मार्ग पर चलते हुए एक दिन आनंद मेरे अंतस में भी पल्लवित हुआ ।
            मार्ग दुरूह था । दुर्गम था । चुनौतियों से भरा पड़ा । सब कुछ अनिश्चित । बस चलते जाना था । एक अज्ञात मार्ग पर किसी अनिश्चित गंतव्य की ओर । कोई कब तक चल सकता था ? थक जाता था । फिर शंकाएँ घेर लेतीं । मन अपने पाश में जकड़ने का प्रयास करता, “किस चक्कर में पड़े हो ? आगे कुछ मिलने वाला भी है कि यूँ ही बावले बने भटक रहे हो ? कहीं ये सब सत्य, प्रेम, आनंद छलावा तो नहीं ? देखो सारी दुनिया को, कितने मजे से जी रहे हैं सारे । सब अपनी नौकरी से संतुष्ट ! परिवार का आनंद लेते हुए ! ये तुम्हें क्या सूझी है ? लौट चलो ।” इस तरह मन अपनी ओर खींचता ।
            लेकिन कोई उत्कंठा थी अंदर जो आगे जाने के लिए प्रेरित करती थी । कोई अद्रश्य शक्ति हाथ थामी होती थी और आगे मार्गदर्शन करती थी । कोई अज्ञात ऊर्जा अपनी ओर आमंत्रित करती थी । तो फिर चल पड़ता था ।

            जब कभी लगता कि बस पहुँच ही गए तो एक नया रास्ता आरंभ हो जाता । जिसे मंज़िल समझते वो एक मोड़ मात्र होता था । मन फिर कहता, “ये एक चक्रव्यूह है । इसमें फँसकर जीवन का अंत हो जाना है । अभी भी समय है, बाहर निकल जाओ ।” लेकिन जब हिम्मत हारने लगती तो कहीं से आवाज़ सुनाई देती, “बस दो क़दम आगे महक रहे हैं चमन ” (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़) । यहाँ तक आते-आते एक अनुभूति होनी शुरू हो गयी थी कि आगे जाना हो सकता है व्यर्थ सिद्ध हो लेकिन पीछे लौटना तो निश्चित ही व्यर्थ होगा । एक बार एक ध्यानी मित्र ने मुझसे पूछा, “ध्यान में आगे कुछ मिलने वाला भी है कि नहीं ?” तो मैंने यही कहा कि, “आगे कुछ मिले न मिले, लेकिन पीछे कुछ भी नहीं मिलने वाला ।”

            एक और चीज़ थी जिसने मुझे अनंत चेतना को जानने की प्यास से भर दिया । मैं अपनी प्रेमिका को चेतना के तल पर प्रेम करना चाहता था । जिस दिन मुझे ये अहसास हुआ कि कभी ना कभी उसकी मृत्यु भी होनी है मेरे अंदर उसे जानने की इच्छा प्रबल हो उठी जो मृत्यु के पार है । मैंने उसे साकार में तो प्रेम किया था, अब निराकार में भी प्रेम करना चाहता था । उसके अस्तित्व को पदार्थ रूप में तो जाना था, अब चेतन रूप में भी जानना चाहता था । ये प्यास भय और जिज्ञासा के मिलन से पैदा हुई थी । प्रेम और सत्य की दोहरी प्यास ने मुझे अधीर कर दिया ! अब मेरे पास और रास्ता ही क्या था सिवाय इसके कि आगे बढ़ते जाओ !
            तो बस बढ़ता रहा…अथक…बस शून्य होता गया…

            फिर अचानक एक दिन कुछ फूटा अंदर ! कोई झरना ! मौन ! आनंद ! मस्ती ! प्रेम ! सब कुछ अतिरेक !
            तब से एक मौन शून्य गहराता जा रहा है…

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